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गोमती रिवर फ्रंट यात्रा 2018 : एक दर्शन गोमती की ज़मीनी हकीकत का

Apr 19, 2018  12:48 Oct 5, 2020  00:00 Swarntabh Kumar Swarntabh Kumar 1,716
जो नदी हमारे लिए पूजनीय रही है, जिसमें सम्पूर्ण भारतीय विरासत समाहित है, जिसने हमें पहचान दी आज वही नदी अपनी पुरानी पहचान को पाने के लिए बेबस है। हम कई बार यह चर्चा करते हैं कि हमें नदियों को जीवन देना है मगर वास्तविकता है कि नदियों को हम नहीं, नदियां हमे जीवन देती हैं. नदियां जीवनदायिनी होती हैं. इनके किनारे ना जाने कितनी संस्कृतियां पोषित होकर अविस्मरणीय ऐतिहासिकता को प्राप्त करती हैं. परंतु आज जीवनदायिनी का जीवन स्वयं संकट में है, भारत की अधिकतर नदियां अपने स्वरूप के लिए संघर्ष कर रहीं हैं. उन्हीं में से एक है गोमती नदी, जो गंगा की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है. एक रिपोर्ट के अनुसार लाख प्रयासों के बावजूद भी गोमती नदी के हालात सुधरे नही है.जमीनी स्तर पर की गई पड़ताल दर्शाती है कि तमाम सरकारी नीतियों के क्रियान्वन के बाद भी गोमती की हालत जस की तस है; बैलेटबॉक्सइंडिया बेवजह नदियों के ऊपर थोपे जा रहे हैं रिवरफ्रंट की खिलाफत करता है। हमने गोमती रिवरफ्रंट को लेकर गहन शोध किया है और निरंतर गोमती रिवरफ्रंट को लेकर कार्य करते आ रहे हैं। इसी विषय पर आधारित हमारी डॉक्यूमेंट्री भी है जिसे शायद सभी को देखने की जरूरत है:
हमारी टीम मार्च 2018  में फिर से एक बार गोमती रिवरफ्रंट और गोमती नदी का निरीक्षण करने आई मगर आश्चर्य है कि यहां कुछ भी नहीं बदला. इतनी हाय-तौबा, इतनी कार्रवाई, इतना कुछ होने के बावजूद भी हालात में कोई  बदलाव नहीं आया है। गोमती में अब भी कचरों के ढ़ेर बहाए जाते हैं। पानी इतना बदबूदार है कि आपका हाथ स्वत: ही आपके नाक पर चला जाता है। एक अच्छी खासी नदी  की  यह  दुर्दशा नदियों पर हो रहे अत्याचार का एक नमूना मात्र है।
जो नदी हमारे लिए पूजनीय रही है, जिसमें सम्पूर्ण भारतीय विरासत समाहित है, जिसने हमें पहचान दी आज वही

 अग्रलिखित तथ्यों पर गौर कीजिए :-

रिवरफ्रंट के नाम पर गोमती की दुर्दशा

क्या बदला है, कुछ भी तो नहीं। गोमती रिवरफ्रंट के नाम पर करोड़ों का खर्च करने के बावजूद भी यहां कुछ नहीं बदला। नई सरकार ने गोमती रिवरफ्रंट पर हो रहे कार्यों को रुकवा कर और करोड़ों हुए खर्च को लेकर सीबीआई की आंखें तैनात तो कर दी मगर बदला कुछ भी नहीं। गोमती की छाती अब भी कराह रही है, मगर पुकार सुने भी तो कौन? गोमती के ऊपर बनने वाला रिवरफ्रंट जो पूरे लखनऊ का आकर्षण होने वाला था। रिवरफ्रंट के नाम पर जहां सौंदर्यीकरण होना था, जिस नदी को साफ और सुथरा करके पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित करने का प्लान था वह आज भी इतने करोड़ों खर्च किए जाने के बाद भी यूं ही गंदगी से भरी पड़ी हुई है और मृत अवस्था में कराह रही है। रिवरफ्रंट के नाम पर गोमती के दोनों ओर दीवार   खड़ी कर दी गई जिससे भूजल स्त्रोतों से नदी का संबन्ध ना के बराबर रह गया, नदी किनारे लगे वृक्ष विकास के नाम पर काट डाले गए जिससे प्रदूषण का स्तर और अधिक हो गया.
जो नदी हमारे लिए पूजनीय रही है, जिसमें सम्पूर्ण भारतीय विरासत समाहित है, जिसने हमें पहचान दी आज वही  

क्या 1400 करोड़ रुपए कम थे गोमती के सुधार के लिए?

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि "दो वस्तुओं की कोई सीमा नही; "एक अंतरिक्ष और दूसरा व्यक्ति की मूर्खता." यह कथन वर्तमान परिपेक्ष्य में सत्य की कसौटी पर खरा उतरता हुआ प्रतीत होता है. नदियों को पहले इंसानी जरूरतों ने मैला कर दिया और फिर उनके सुधारीकरण में पानी की तरह पैसे फूंक डाले, यह मूर्खता का प्रमाण ही तो है. गोमती नदी के संरक्षण पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं परन्तु गोमती की दशा स्वयं ही अपना दुखड़ा कहती दिखती है. अथाह प्रदूषण, तटीय क्षेत्रवासियों द्वारा अतिक्रमण, पानी के बहाव में अल्पता, सरकारी नीतियों का दिखावा यह सब काफी है गोमती का दर्द दर्शाने के लिए.
 हालिया रिपोर्ट पर गौर करे तो पिछले दो वर्षों में लगभग 1400 करोड़ रुपए गोमती रिवर फ्रंट परियोजाओं में खर्च कर दिए गए परन्तु परिणाम केवल बदतर ही निकला. आज गोमती और अधिक प्रदूषित हो गई है, रबर डेम एवम् मेट्रो सिटी रोड के पास के इलाकों में गोमती के ऊपर सघन झाग उसके प्रदूषित स्वरूप को बयान करते दिख रहे हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया की हालिया रिपोर्ट के अनुसार ED विभाग की शिकायत पर उत्तर प्रदेश सिचाईं विभाग के 8 सीनियर अभियंताओं के खिलाफ गोमती रिवर फ्रंट परियोजना में गडबडी करने, घूसखोरी करने व प्रमुख दस्तावेजों की गोपनीयता भंग करने के आरोप में केस दर्ज किया गया. परन्तु गोमती की वास्तविक गरिमा को भंग करने में न जाने कितने लोग शामिल हैं, उसपर सरकार का ध्यान कब जाएगा यह गौरतलब है.

गोमती संरक्षण की जमीनी हकीकत

TOI द्वारा की गयी जांच-पड़ताल से दृष्टि गोचर हुआ कि गोमती परियोजनाओं के नाम पर जो पैसे पानी तरह बहाए गए उनका कोई उचित परिणाम नही निकला. रिवर फ्रंट के अंतर्गत लगी टाइलें व पत्थर जगह जगह टूटे हुए हैं, सरकारी विभागों द्वारा फाउंटेंस के नाम पर 40 करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद भी सभी फाउंटेंस निष्क्रिय खड़े हुए है, लोहिया पुल के पास लगे फाउंटेंस के पार्ट्स चुरा लिए गए तथा रबर डेम के पास लगी लाइट्स व म्यूजिकल फाउंटेंस उचित रखरखाव के अभाव में ख़राब हो चुके हैं. यहां तक कि गोमती के किनारों पर कूड़े का अंबार लगाना आम बात है. गोमती के दोनों किनारों पर सीवेज के प्रत्यक्ष बहाव को रोकने के लिए बनाई गई एक बड़ी सीवेज संयंत्र योजना अभी तक अटकी हुई है. इस परियोजना को अभी तक हरी झंडी नही दिखाई जाना एक बड़ी सरकारी असफलता का द्योतक है.
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सरकारी जांच पड़ताल प्रभावहीन

राज्य सरकार द्वारा गोमती की जांच पड़ताल के नाम पर केवल खर्चें किए गए. जिससे परियोजनाओं में बाधा के अतिरिक्त कुछ और हाथ नहीं लगा. सिंचाई विभाग भी केवल गोमती योजनाओं का खाका व इससे जुड़े खर्चें बताता रहा परंतु वस्तिवकता में 2016 के अंत तक लोहिया पथ के केवल 1.5 किमी. क्षेत्र का नवीनीकरण किया गया और वर्तमान में उसकी हालत भी संरक्षण के अभाव में बदतर है. इसके साथ ही स्थानीय निवासियों द्वारा किया गया गोमती क्षेत्र अधिग्रहण चिंता का विषय बना हुआ है. गोमती के उद्गम स्थल पीलीभीत के माधोटांडा कस्बे से शाहजहांपुर के बीच नदी पर अतिक्रमण अत्याधिक है, खेती के नाम पर गोमती के किनारों का अधिग्रहण आम बात है. कुछ स्थानों पर तो गोमती नजर भी नहीं आती है.

नदी विशेषज्ञ डॉ. वेंकटेश दत्ता का मानना है कि गोमती यात्रा के दौरान किसान नदी की जमीन वापस करने को तैयार थे. प्रशासन चकबंदी रिकॉर्ड; जिसमे गोमती की जमीन ही गायब है; को दुरुस्त कर नदी की जमीन से जनता का अतिक्रमण समाप्त कराए तो नदी का स्वाभाविक प्रवाह बना रह सकता है. इसके साथ ही गोमती के किनारों पर वृहद वृक्षारोपण की भी आवश्यकता बनी हुई है.

जो नदी हमारे लिए पूजनीय रही है, जिसमें सम्पूर्ण भारतीय विरासत समाहित है, जिसने हमें पहचान दी आज वही

जलकुंभी से कुपोषित हो रहा नदी का जल

लगातार बढ़ती जलकुंभी से गोमती के जल में पोषक तत्वों का ह्रास हो रहा है. एक हालिया रिपोर्ट दर्शाती है कि जलकुंभी की वृद्धि से गोमती में लगभग 30 से 40% तक ऑक्सीजन लेवल घटा है, जिससे जलीय जीवन संकट में  है. इसके अतिरिक्त जलकुंभी सूर्य की रोशनी पानी के भीतर जाने से रोकती है जिससे जलीय पौधें प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया के अभाव में दम तोड रहे हैं. 

"गोमती का बहाव कम होना और प्रदूषण का अत्यधिक बढ़ना, इन दोनों परिस्थितियों के कारण ही जलकुंभी को पनपने का अवसर मिल जाता है."(प्रो. अमिता कनौजिया, लखनऊ वि. वि)

जो नदी हमारे लिए पूजनीय रही है, जिसमें सम्पूर्ण भारतीय विरासत समाहित है, जिसने हमें पहचान दी आज वही

कुकरैल नाला बन रहा प्रदूषण का मुख्य कारण

जल निगम द्वारा सिंचाई विभाग को लिखे पत्र से पता चलता है कि कुकरैल नाले में पानी छोड़ना गोमती प्रदूषण को और बढ़ा रहा है; सिंचाई विभाग रजौली रजवाहा एस्केप से कुकरैल नाले में अतिरिक्त पानी छोड़ रहा है, जो गंदगी के साथ शारदा नदी में मिल रहा है और आगे चल कर यही जल गोमती में गिर उसे प्रदूषित कर रहा है. 
जो नदी हमारे लिए पूजनीय रही है, जिसमें सम्पूर्ण भारतीय विरासत समाहित है, जिसने हमें पहचान दी आज वही

उत्तर प्रदेश गंगा हरितिमा की तर्ज़ पर हो गोमती हरियाली अभियान

जो नदी हमारे लिए पूजनीय रही है, जिसमें सम्पूर्ण भारतीय विरासत समाहित है, जिसने हमें पहचान दी आज वही नदी अपनी पुरानी पहचान को पाने के लिए बेबस है। हम कई बार यह चर्चा करते हैं कि हमें नदियों को जीवन देना है मगर वास्तविकता है कि नदियों को हम नहीं, नदियां हमे जीवन देती हैं. अत: आवश्यक है कि जिस प्रकार NGT द्वारा गंगा किनारे वृहद वृक्षारोपण की मुहिम उत्तर प्रदेश गंगा हरीतिमा योजना चलाई जा रही है, और तटीय क्षेत्रों में जन सहभागिता व सरकारी विभागों के माध्यम से सघन वृक्षारोपण, मृदा एवं जल संरक्षण, प्रदूषण की रोकथाम आदि को सक्रिय किया जा रहा है उसी प्रकार गोमती के लिए भी इस प्रकार के अभियान अमृत साबित हो सकते हैं. नदी किनारे जलग्रहण क्षेत्रों में पलाश, महुआ, शीशम आदि वृक्षों के माध्यम से प्रदूषण को नियंत्रित होने व भूजल रिचार्ज होने में सहायता मिल सकती है, और गोमती एक बार फिर से अपना प्राचीन स्वरुप प्राप्त कर अठखेलियां करती दिख सकती है. बस विचारों को प्रयासों का मुखौटा पहना कर व्यवहारिकता के मैदान में लाना है और बैलेटबॉक्सइंडिया की टीम इसके लिए निरंतर प्रयासरत रहेगी.
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