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ByRakesh Prasad Rakesh Prasad   {{descmodel.currdesc.readstats }}

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आज़ाद भारत का पहला चुनाव 1952 में हुआ था। किंतु भारत के निर्वाचन आयोग की शक्तियों का एहसास जनता को पहली बार तब हुआ, जब 1990 में टी. एन. शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त हुए। इसके बाद से निर्वाचन आयोग ने हर चुनाव में अपने को बेहतर करने की कोशिश की; बावजूद इसके हर चुनाव ने साबित किया कि निर्वाचन आयोग में सुधार की गुजांइश अभी काफी है। बीते चुनाव के बाद उपजी अपेक्षाओं में से एक अपेक्षा यह भी है।  

एक चरण में मतदान करा पाने में अक्षम

ते चुनाव ने बताया कि कई चरण में चुनाव होने से न सिर्फ मतदान प्रभावित होता है, बल्कि दलों, उम्मीदवारों और खुद निर्वाचन आयोग का चुनाव खर्च बढ़ जाता है। चुनाव प्रक्रिया की लंबी अवधि के लंबे समय के लिए शासन में सब कुछ ठप्प पड़ जाना, तीसरा नुकसान है। इस दौरान मीडिया में भी बस चुनाव का ही शोर रहता है। तात्कालिक महत्व के कई मुद्दे चर्चा से गायब हो जाते हैं। जाहिर है कि भारत के निर्वाचन आयोग को अपनी क्षमता के इतने विस्तार की ज़रूरत है कि वह एक चरण में चुनाव संपन्न करा सके। 

दोषपूर्ण मतदाता सूची

मतदाताओं के नाम, पिता/पति का नाम तथा उम्र दर्ज होने में गलती न हो; निर्वाचन आयोग आज तक यह गारंटी नहीं दे पाया। मतदाता सूचियों  के दोषपूर्ण होने की बात भी हर बार सामने आती है। कभी मौजूद मतदाता का नाम मतदाता सूची से कटा मिलता है, तो कभी जो मृत है अथवा वहां रहता ही नहीं, उसका नाम मतदाता सूची में मिलता है। वाराणसी में तो विश्वनाथ मंदिर के महंत और स्वयं मेयर की पत्नी का नाम मतदाता सूची से गायब मिला। एक सर्वेक्षण के मुताबिक, करीब 15 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने पैतृक और शहरी निवास दोनो जगह अपने नाम लिखा रखे हैं। नाम काटने-जोड़ने में भी स्थानीय दबंगों की भूमिका देखी आई है। सूची में नाम काटने और जोड़ने की प्रक्रिया के दोषपूर्ण होने के कारण यह संभव हो पाता है। इसमें सुधार कब होगा ? 

मतदान के गलत आंकडे़

निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली में सुधार की ज़रूरत बताता सबसे गंभीर व ताजा मामला उत्तराखण्ड से आया। उत्तराखण्ड में 15 फरवरी को मतदान हुआ। मतदान के पश्चात् 15 फरवरी को ही उत्तराखण्ड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्री राधा रतूड़ी ने प्रेस वार्ता की। प्रेस वार्ता में उन्होने 68 प्रतिशत मतदान का आंकड़ा पेश किया। पूरे आंकडे़ आने पर विभाग ने 70 फीसदी मतदान की उम्मीद जताई। हफ्ते भर बाद राज्य निर्वाचन विभाग ने 65.64 प्रतिशत मतदान के आंकडे़ पेश किए। अंतर सिर्फ कुल मतदान प्रतिशत में नहीं मिला, उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी ज़िले में 73 की बजाय 68.29 प्रतिशत, टिहरी ज़िले में 60 की बजाय 55.40 प्रतिशत, पौड़ी ज़िले में 60 की बजाय 54.95 प्रतिशत तथा देहरादून में 67 की बजाय 63.45 प्रतिशत का अंतिम आंकड़ा सामने आया। वोट प्रतिशतों में आया यह अंतर कोई पहली बार नहीं है। पिछले चुनावों के दौरान उत्तराखण्ड और उत्तर-प्रदेश में हुए कुल मतदान और घोषित परिणाम में शामिल कुल मतों में अंतर पाया गया था। गाजियाबाद के नीरज सक्सेना और संजीव गुप्ता द्वारा यह बात चुनाव आयोग के संज्ञान में लाने के बाद केन्द्रीय निर्वाचन आयोग ने संबंधित आंकड़ों को अपनी वेबसाइट से हटाकर अपना दोष छिपाने की कोशिश की थी। इस बार केन्द्रीय निर्वाचन आयोग ने सख्ती दिखाने की बात की; किंतु इस प्रकरण से स्पष्ट है कि मामला सख्ती से ज्यादा, सुधार का है। 

ईवीएम शंका का प्रमाणिक समाधान ज़रूरी

उक्त प्रकरण के बाद यह शंका उठनी स्वाभाविक है कि गड़बड़ी व्यापक है; या तो इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में अथवा निर्वाचन में लगी टीमों में। कुछ दिन पहले महाराष्ट्र नगरपालिका चुनाव में भी ईवीएम के जरिये धांधली की शिकायत की गई थी। ईवीएम को लेकर बसपा ने भी अदालत में जाने की बात कही। दिल्ली नगर निगम चुनावों को मतपत्रों के जरिए कराने की आम आदमी पार्टी की मांग को दिल्ली उपराज्यपाल ने खारिज कर दिया । ईवीएम पर उठने वाली इन उंगलियों को आप हारे हुए की खीज जरूर कह सकते हैं, लेकिन भूलने की बात नहीं कि वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान श्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी ईवीएम पर संदेह व्यक्त किया था। श्री सुब्रहमण्यम स्वामी ने ईवीएम के खिलाफ क़ानूनी लड़ाई लड़ी थी और भाजपा प्रवक्ता श्री जीवीएल नरसिंह राव ने ईवीएम को लोकतंत्र के खिलाफ बताते हुए बाकायदा एक किताब लिखी थी। श्री किरीट सोमैया तथा महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फड़नवीस स्वयं 2010 के ईवीएम विरोधी आंदोलन में शामिल रहे हैं। मतलब यह कि हार होने पर खुद भाजपा ने भी ईवीएम पर सवाल उठाये हैं। 

ईवीएम विरोधी आंदोलन के वक्त अमेरिका के मिशीगन विश्वविद्यालय केे शोधकर्ताओं ने भी भारत में प्रयोग की जा रही वोटिंग मशीनों में छेड़छाड़ की संभावना जताई थी। शोधकर्ता ने घर पर बनाई एक मशीन तथा मोबाइल के जरिये ईवीएम में दर्ज नतीजों को बदलकर दिखाया था। 2010 के ईवीएम विरोधी आंदोलन के दौरान हैदराबाद के इंजीनियर हरिप्रसाद ने भी बाकायदा प्रदर्शन कर यह दर्शाया था। छेड़छाड़ की संभावना को सिद्व करता एक वीडियो भी आजकल सोशल मीडिया पर देखा गया है। तकनीकी जानकारों के मुताबिक, जरूरी नहीं है कि इस धांधली में निर्वाचन आयोग शामिल हो। वोटिंग मशीन आपूर्ति करने वाली कंपनियों की मिलीभगत से भी छेड़छाड़ को व्यापक पैमाने पर अंजाम दिया जा सकता है। 

पूर्व चुनाव आयुक्त श्री एस. वाई. कुरेशी ने इस संभावना को सिरे से खारिज किया है। उन्होने लिखा है कि भारत में ईवीएम तथा इसमें इस्तेमाल होने वाली चिप का निर्माण इलेक्टॅªानिक्स कारपोरेशन आॅफ इण्डिया लिमिटेड और भारत इलेक्ट्राॅनिक्स लिमिटेड जैसे दो ऐसे उद्यम करते हैं, जिनकी प्रतिष्ठा शंकाविहीन है। ईवीएम मशीनों को दूसरी मशीन अथवा सिस्टम से जोड़कर संचालित करना असंभव है। अतः हैकिंग का तो प्रश्न ही नहीं उठता। पीठासीन अधिकारी द्वारा मतदान यूनिट को सक्रिय किए बगैर कोई वोट रिकाॅर्ड नहीं किया जा सकता। ईवीएम को जिस खास गुलाबी पेपर से सील किया जाता है, उस पर सियासी दलों के प्रतिनिधियों केे हस्ताक्षर कराये जाते हैं। समक्ष आये ईवीएम शंका मामलों को मुंबई और कर्नाटक उच्च न्यायालय की क्लीन चिट के बाद शंका करना बेवजह है। 

अब चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका का संज्ञान लेते हुए निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर दिया है, इसलिए जरूरी है कि निर्वाचन आयोग को चाहिए कि महज् बयान देने की बजाय, प्रमाणिक समाधान प्रस्तुत करे; ताकि ईवीएम पर लोगों का भरोसा पुनः बहाल हो। यहां गौर करने की बात यह भी है कि इसी दृष्टि से वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि 2019 के लोकसभा चुनाव तक हर वोट की मतदाता पावती रसीद व्यवस्था सुनिश्चित की जाये। विशेषज्ञों के अनुसार, 2019 में हमें मतदाता पावती रसीद युक्त 20 लाख वीवीपीएटी मशीनों की ज़रूरत होगी। किंतु इस दिशा में निर्वाचन आयोग की तैयारी अभी भी ’सौ दिन चले अढ़ाई कोस’ वाली है। निर्वाचन आयोग अपनी जिम्मेदारी निभाये।

आदर्श आचार संहिता उल्लंघन पर कार्रवाई में  फिसड्डी

सुधार का चैथा बिंदु, आदर्श आचार संहिता के उल्लंघनकर्ताओं पर कार्रवाई करने में निर्वाचन आयोग का फिसड्डी होना है। सुप्रीम कोर्ट ने धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय और भाषा के आधार पर वोट मांगने पर ताज़ा रोक आपको याद होगी। रोक के तुरंत बाद प्रचारकों की जुबां पर आये धर्म-जति सूचक शब्दों को आप भूले नहीं होंगे। बसपा समर्थकों द्वारा पैसा बांटे जाने की खबरें अंतिम चरण में उत्तर प्रदेश के शिवपुर विधानसभा क्षेत्र से आईं। क्या कभी किसी पर कोई ठोस कार्रवाई हुई ? तय सीमा से अधिक चुनावी खर्च पर कार्रवाई का नियम है; बावजूद इसके खर्च सीमा का उल्लंघन बराबर जारी है। अमेठी के सपा प्रत्याशी गायत्री प्रजापति द्वारा मंगाई साड़ियां फतेहपुर में पकड़ी गईं। सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। एक्जिट पोल चुनाव को प्रभावित करते हैं। ऐसी मान्यता के चलते, चुनाव के दौरान एक्जिट पोल के नतीजों को किसी भी मीडिया प्लेटफार्म पर पेश करने पर रोक है। बीती 11 फरवरी को एक नामी समाचारपत्र की वेबसाइट ने इस रोक का उल्लंघन किया। प्रबंधन ने कहा कि संपादन ने ऐसा विज्ञापन विभाग के कहने पर किया, जबकि गिरफ्तारी संपादक की हुई। यही सब वजह है कि आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन वाले निर्वाचन आयोग की कभी चिंता नहीं करते। 

शपथपत्र सत्यापन में अक्षम

नामांकन के वक्त झूठी जानकारी देने पर सदस्यता से वंचित किए जाने का नियम है; बावजूद इसके उम्मीदवार झूठे-सच्चे शपथपत्र देकर चुनाव लड़ते हैं। क्यों ? क्योंकि निर्वाचन आयोग के पास शपथपत्र सत्यापन की कोई व्यवस्था नहीं है। मौलिक भारत ट्रस्ट की एक याचिका के जवाब देते हुए केन्द्रीय निर्वाचन आयोग ने दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मतदान और नामांकन दाखिल करने की बीच की समयावधि काफी कम होती है; लिहाजा, निर्वाचन आयोग द्वारा नामांकन पत्रों और शपथपत्रों की सत्यता की जांच संभव नहीं है। निर्वाचन आयोग, यह शपथपत्र छह माह पूर्व क्यों नहीं ले सकता अथवा अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए वह किसी अन्य एजेंसी की मदद क्यों नहीं ले सकता ?

दलों पर नियंत्रण में अक्षम

राजनीतिक दलोें के पंजीकरण व मान्यता देना केन्द्रीय निर्वाचन आयोग का काम है। जन प्रतिनिधि कानून - 1951 के अनुसार निर्वाचन आयोग सिर्फ उसी दल का पंजीक्रण करेगा, जो भारतीय संविधान, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता तथा समाजवाद पर पूरा विश्वास करता हो। चुनाव प्रचार के दौरान और आगे-पीछे राजनीतिक दल पंजीकरण की इस शर्त के साथ खिलवाड़ करते ही रहते हैं। निर्वाचन आयोग ने क्या खिलवाड़ करने वाले ऐसे किसी दल का पंजीकरण रद्द किया गया ? आवश्यक मत न प्राप्त करने पर राष्ट्रीय दलों की मान्यता रदद करने का नियम है। लेकिन ऐसे सैकड़ों राजनीतिक दल ऐसे हैं, जो चुनाव ही नहीं लडते। मीडिया पड़ताल में ऐसे निष्क्रिय दलों के बारे में कहा गया कि ये चंदा वसूली के जरिये महज् काला धन को सफेद करने के लिए सक्रिय रहते हैं। ऐसे दलों की मान्यता रद्द करने का काम कौन करेगा ? यदि कोई दल अपनी आंतरिक नियमावली के अनुसार, अपने संगठन का चुनाव समय से न कराये, तो निर्वाचन आयोग उसके चुनाव लड़ने पर चुनाव लड़ने पर रोक लगा सकता है। निर्वाचन आयोग ने सिर्फ चेतावनी देता है, कभी कोई कार्रवाई नहीं करता। आखिरकार, क्यों ? 

शक्तियों की अस्पष्टता

सुधार का एक बिंदु, निर्वाचन आयोग की शक्तियों को लेकर अस्पष्टता है। हालांकि अनुच्छेद - 327 निर्वाचन प्रक्रिया से संबंधित समस्त आयामों के लिए विधि निर्माण का अधिकार संसद को प्रदान करता है; बावजूद इसके चुनाव संबंधी मामलों में कभी संसद, तो कभी सुप्रीम कोर्ट तो कभी स्वयं चुनाव आयोग को कदम उठाते देखा गया है। 1990 में मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका में रहे टी. एन. शेषन ने कुछ ऐसी शक्तियांे का भी प्रयोग किया था, जिनके बारे में कहा गया कि वे चुनाव आयोग के अधिकार में नहीं हैं। 28 अगस्त, 1997 को निर्वाचन आयोग ने कहा कि न्यायालय द्वारा दण्डित व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता, चाहे उस व्यक्ति ने दंड के विरूद्व उच्च न्यायालय के अपील की हुई हो। इस पर तत्कालीन सरकार ने असहमति प्रकट की। 13वीं लोकसभा के चुनाव दौरान निर्वाचन आयोग ने चुनावी सर्वेक्षण तथा अनुमानित परिणाम के प्रसारण पर रोक लगाई, तो सुप्रीम कोर्ट ने इससे असहमति जताई। इससे स्पष्ट है कि चुनाव आयोग की शक्तियों की स्पष्ट व्याख्या नहीं है; जबकि यह अति आवश्यक है। स्पष्ट और सुप्रीम न्यायिक शक्तियों के अभाव में निर्वाचन आयोग का पूरी क्षमता के साथ काम करना असंभव है।

चुनाव आयुक्तों के राजनीतिक होने का खुला रास्ता

अनुच्छेद 324 के अनुसार, संवैधानिक तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त आवश्यक है। संविधन ने बाकी चुनाव आयुक्त के अस्तित्व का निर्णय राष्ट्रपति की इच्छा पर छोड़ दिया है। अन्य चुनाव आयुक्तों की संख्या भी संवैधानिक तौर पर निर्धारित नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की बाबत् यह कहा गया है कि कार्यकाल से पूर्व उसे उसी विधि से हटाया जा सकता है, जिस विधि से सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जा सकता है; किंतु अन्य चुनाव आयुक्तों के बारे में कहा गया है उन्हे मुख्य चुनाव आयुक्त के परामर्श से ही हटाया जा सकता है। इससे केन्द्र सरकार, मुख्य चुनाव आयुक्त को प्रभावित कर अपनी मर्जी का चुनाव आयुक्त नियुक्त करा सकते हैं। संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य की योग्यता भी निर्धारित नहीं है। लिहाजा, केन्द्र सरकार अपनी मर्जी के किसी भी व्यक्ति को मुख्य तथा अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्त कर देती है। चुनाव आयुक्त समेत सभी मुख्य पदों  पर बैठे अधिकारियों  में सेवानिवृति के पश्चात् आगे की राजनीतिक पोस्टिंग का लोभ देखा ही गया है। ऐसे में मंत्रिपरिषद की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की नियुक्ति निष्पक्ष नहीं कही जा सकती। स्पष्ट है कि निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता हेतु एक ज़रूरत चुनाव आयुक्तों की योग्यता, नियुक्ति, बर्खास्तगी के नियम निर्धारण की भी है। 

लेखक: अरुण तिवारी

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