Pilot Contribution and reputation figures are AI-assisted pilot estimates from public activity — not an official record, and subject to correction. Verify against the original source before any decision.

Dr Dinesh kumar Mishra

Dr Dinesh kumar Mishra

Bagbera(East Singhbhum-Dhalbhum-831002)

   “भारत में नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है और माँ केवल माँ है, वह संसाधन या शोक कभी नहीं हो सकती. नदियां प्रकृतिदत्त उपहार है एवं धरती पर साक्षात् ईश्वर स्वरुप हैं."   (डॉ दिनेश कुमार मिश्र) बेहद सरल, सजीव और भावपूर्ण शब्दों में नदियों की भारतीय

◆ 6.9302 contribution score 21 reputation 19 views · 7d ▼ -11 600 all-time
What you're looking at · a pilot performance-analytics framework

BallotBoxIndia treats a district's development like a shared fund, and every socio-political innovator — leader, NGO, business, expert, journalist, activist — like a contributor whose impact we try to measure. The scores here are an experiment to tell apart what an innovator actually moved (नेता का हाथ · their real contribution) from what circumstance carried (हालात · the wave).

Contribution ≈ Alpha Circumstance ≈ Beta Experimental · community-verified

Contributions & updates

Articles, research and updates published by Dr Dinesh kumar Mishra.

Biography & background — self/editorially authored, may be outdated

 

 “भारत में नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है और माँ केवल माँ है, वह संसाधन या शोक कभी नहीं हो सकती. नदियां प्रकृतिदत्त उपहार है एवं धरती पर साक्षात् ईश्वर स्वरुप हैं."   (डॉ दिनेश कुमार मिश्र)

बेहद सरल, सजीव और भावपूर्ण शब्दों में नदियों की भारतीय परिभाषा उजागर कर देने वाले डॉ दिनेश कुमार मिश्र एक जाने माने पर्यावरणविद्, बाढ़ एवं सिंचाई अभियंता, जलतत्त्व विशेषज्ञ, नदी संरक्षणकर्ता व अद्भुत लेखन क्षमता के धनी हैं, उन्होंने अपने जीवन का तीन दशक से भी अधिक का समय सरिताओं को समर्पित कर दिया. गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन की नदियों के लिए 1984 से अथक कार्य कर रहे दिनेश जी ना केवल भावी पीढ़ी के लिए मिसाल हैं अपितु देश में सुगम नदी तंत्र के लिए प्रयासरत लोगों के लिए जीता जागता उदाहरण बन कर भी खड़े हुए हैं. परंरागत बाढ़ नियंत्रण शैली द्वारा उत्तरी बिहार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में नदी पुनरुत्थान की लहर लाने वाले डॉ. दिनेश कुमार मिश्र जी देश के उल्लेखनीय नदी संरक्षणवादी के तौर पर जाने जाते हैं.

 
 “भारत में नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है और माँ केवल माँ है, वह संसाधन या शोक कभी नहीं हो सकती

कहानी अभियंता से नदी-पुत्र बनने की  –

डॉ. दिनेश कुमार मिश्र ने आई.आई.टी खड़गपुर से सिविल इंजीनियरिंग (1968) तथा एम. टेक (1970) की डिग्री प्राप्त की. वर्ष 2006 में मिश्र जी ने दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी से पीएचडी की मानद उपाधि भी प्राप्त की एवं वें निरंतर 3 वर्ष अशोका फेलो भी रहें हैं. नदी कार्यकर्ता के रूप में विख्यात मिश्र जी अपने प्रभावी लेखन कार्य, रोचक व्याख्यानों व जन जागरण के माध्यम से सरिता संरक्षण को प्रमुखता दे रहे हैं. उन्होंने बिहार की लगभग सभी प्रमुख नदियों पर गहन शोध किया है, जिसके आधार पर तटीय जीवन से जुड़े तमाम पहलुओं को उन्होंने दृष्टिगोचर किया.

 
 “भारत में नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है और माँ केवल माँ है, वह संसाधन या शोक कभी नहीं हो सकती

1984 में बिहार बाढ़ के दौरान मिश्र जी ने सर्वप्रथम बाढ़ का विकराल स्वरुप देखा और उससे व्यथित होकर उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन नदियों के विकास के लिए अर्पित करने का मन बना लिया. 1987 के आरंभ से ही उन्होंने उत्तरी बिहार की नदियों को सांस्कृतिक, ऐतिहासिक व भौगोलिक स्तर पर संलेखित करना शुरू कर दिया. आधुनिक बाढ़ नियंत्रक पद्धति के नदी पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का विश्लेषण करना मिश्र जी के शोध का सर्वप्रमुख उद्देश्य रहा है. उनके द्वारा बिहार बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए बहुत से कार्यक्रम चलाए गए, जिनमें उन्होंने लोगो को सचेत बाढ़ कार्यकर्ता बनने के लिए उत्सुक किया. विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से मिश्र जी ने बाढ़ से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों का ब्यौरा संग्रहित किया, बिहार की बाढ़ नियंत्रक नीतियों, तटबंधीय तकनीकों आदि से जुड़ शासकीय प्रभावों की समालोचना की तथा बाढ़ विस्थापित लोगो के जीवन की मार्मिक झांकी को अंकित करने का प्रयास किया.

 

नदियों के पौराणिक, सांस्कृतिक एवं परम्परागत स्वरुप के प्रणेता -

नदियों को कभी बालिका स्वरुप तो कभी माँ स्वरुप मानने वाले मिश्र जी ने उनके पौराणिक महत्त्व को विशेष रूप से उकेरा है. तटीय प्रदेशों में सदियों से चली आ रही नदी परम्पराओं को उन्होंने मुखर रूप प्रदान किया है. मिश्र जी अपने वक्तव्यों में बड़े रोचक ढंग से कहते है कि,

“कोसी बालिका है, इसीलिए वह चंचल है, जहां दिल करता है वही घुमने निकल पड़ती है. वहीं दूसरी ओर गंगा, यमुना आदि नदियाँ विवाहिता स्त्री हैं, सो वें स्वभावगत शांत हैं.”

साथ ही मुक्त वेणी, बद्ध वेणी, पार्वती, सरोजा इत्यादि नाम देकर नदियों की वेद पौराणिक महिमा को मिश्र जी स्पष्ट करते हैं. उनका मानना है कि नदियों का स्थानीय निवासियों से एक खास नाता रहा है, तटीय जनसंख्या के लिए नदियाँ कभी शोक नहीं रहीं. बाढ़ को भी लोगों द्वारा परम्परागत रूप से ही देखा जाता था, स्वतंत्रता से पहले तक बिहार में लोग स्वयं चाहते थे कि बाढ़ उनके इलाके में आए जिससे कृषि को उन्नति मिले.

किसानो ने अपने हिसाब से नदी जल उतराव- चढ़ाव का लोक नामकरण कर रखा था ; जैसे, नदी का मजरना, बोह, हुम्मा, साह तथा प्रलय आदि. इस प्रकार मिश्र जी के अनुसार नदियों में सम्पूर्ण संस्कृति, लोक परम्पराएं, अंतर्निहित भावुकताएं एवं विस्तृत एतिहासिकता विद्यमान रहती है.

 

बाढ़ को आपदा नहीं , प्राकृतिक अनिवार्यता के तौर पर देखने की आवश्यकता -

मिश्र जी ने नदियों की भौगोलिकता का गहन अध्ययन किया है, जिसके आधार पर उन्होंने स्पष्ट किया कि बाढ़ किसी प्रकार की आपदा नहीं, बल्कि तटीय प्रदेशों के लिए एक कुदरती प्रक्रिया है. आज़ादी से पूर्व तक बाढ़ का आना जाना लोगों के लिए इतना कष्टकारक नहीं था, जितना वर्तमान में गलत नीतियों के कारण हो गया है. बाढ़ से भूजल में वृद्धि होती है, सतही जल सुरक्षित बना रहता है, अत्याधिक जल के कारण वर्षा की दर अच्छी रहती है तथा सर्वाधिक लाभ कृषि को होता है, क्योंकि बाढ़ से आई गाद उपज के लिए अमृत होती है. नदी किनारे बसने वाले लोग इस तथ्य को भली भांति जानते भी हैं और समझते भी हैं. परन्तु स्वतंत्रता के बाद उन्हें राजनेताओं द्वारा तटबंध बनाने को लेकर बरगलाया गया, जिससे आज बाढ़ उनके लिए आपदा बन गयी है.

Ad

 

आधुनिक बाढ़ प्रबंधन नीति : केवल छलावा -

नदियों की चंचलता को बांधने के लिए वर्तमान में नदियों को पाटने का कार्य किया गया. तटबंध, बांध, बैराज आदि के माध्यम से नदियों के दायरे को सीमित कर दिया गया, जिससे फायदे के स्थान पर केवल नुकसान हुआ. मिश्र जी अपने श्रृखलाबद्ध शोध के जरिये स्थिति पर प्रकाश डालते हुए समझाते हैं कि तटबंधों के बनने से नदियों व लोगों के मध्य एक दीवार खड़ी कर दी गयी. बाढ़ को रोकने के लिए बने ऊंचे तटबंधों से गाद नदी तल में एकत्रित होने लगी और नदी तलहटी ऊंची उठ गयी. मिश्र जी बताते हैं कि,

"1963 में कोसी पर बनने वाले बांध से आज 50 सालों में कोसी का ताल 250 इंच उपर उठ गया है. तल उठने से नदियों का स्वाभाविक गुण, जो पानी को कैचमेंट क्षेत्र से समुन्द्र तक ले जाना था, अब वह असंभव हो गया है और इस कारण बाढ़ का स्वरूप भयावह होता जा रहा है."

दामोदर नदी की एतिहासिकता अंकित करते हुए मिश्र जी बताते हैं कि स्वतंत्रता से पहले बंगाल के एक चीफ इंजीनियर विलियम इंगलिस ने दामोदर नदी क्षेत्र का दौरा करते हुए सरकार को नदी के प्राकृतिक वेग से छेड़-छाड़ करने और तटबंध बनाने को लेकर सख्त हिदायत दी थी. आज सरकार की बाढ़ प्रबंधन नीति केवल दिखावे के लिए है, जिसमे करोड़ों अरबों रूपये लगा देने के बाद भी समस्या साल दर साल विकराल होती जा रही है. कुदरत के साथ दो दो हाथ करने का खामियाजा आज आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है.

 

सरकारी पुनर्वास योजना की ज़मीनी हकीकत -

Ad

1952 में जो बिहार बाढ़ क्षेत्र 25 लाख हेक्टेयर था, वह 1994 में बढ़कर 68.8 लाख हेक्टेयर हो गया. मिश्र जी के शब्दों में सरकार द्वारा पानी की तरह करोड़ों खर्च करने के बाद भी बाढ़ क्षेत्र का तीन गुना अधिक बढ़ना शासकीय असफलता को स्पष्ट करता है. अपनी पुस्तक बागमती की सद्गति में मिश्र जी पुनर्वास की धरातलीय वास्तविकता पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि,

“टुकड़े टुकड़े में किये गये कार्यक्रम समस्या का समाधान नहीं करते, बल्कि वह समस्या को सिर्फ एक स्थान से दुसरे स्थान तक पहुंचाते भर हैं. जिसके दरवाजे पर समस्या पहुंचाई जाती है, वह निश्चित रूप से कमजोर होता है."

पुनर्वास के नाम पर लोग तटबंधों पर रहने को मजबूर हैं और राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव में वे लोग हाशिये पर धकेल दिए गये हैं. यह विस्थापित जनसंख्या सरकारी वोट बैंक बनकर रह गयी है, जिसके माध्यम से चुनावी रोटियां सेंकी जाना सरकार के लिए बेहद आम विषय है. मिश्र जी ने वर्षों तक कोसी, बागमती इत्यादि पुनर्वास क्षेत्रों में रहकर विस्थापितों से वार्ता करके यह नतीजा निकला कि कागजों पर पुनर्वास को लेकर जो भी सच्चाई दर्शायी गयी है, उसकी व्यवहारिकता कोरी काल्पनिकता का आभास देती दिखती है.

 

बाढ़ मुक्ति मोर्चा (बीएमए) का सफल संचालन -

मिश्र जी लगभग तीन दशकों से बाढ़ मुक्ति मोर्चा अभियान से जुड़कर विभिन्न राज्यों के 700 से अधिक कार्यकर्ताओं के स्थानीय समूहों के द्वारा नदी तटों से सम्बन्धित सूचनाओं का आकलन कर रहे हैं. भारत के बाढ़-उन्मुख क्षेत्रों में समितियों के गठन के माध्यम से वें बाढ़ सम्बन्धित लोक परम्परागत तरीकों का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं. वर्ष 1992 से प्रकाश में आया बाढ़ मुक्ति मोर्चा सम्बन्धित क्षेत्रों की जनता के मध्य वार्षिक बैठकों, पदयात्रा, शांतिपूर्ण प्रदर्शन आदि से शासकीय नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठा जागरूकता का बढ़ा रहा है.

Ad

 
 “भारत में नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है और माँ केवल माँ है, वह संसाधन या शोक कभी नहीं हो सकती

यह आन्दोलन विभिन्न शैक्षिक कार्यक्रमों के जरिये नागरिक समूहों को नदियों पर अपने सांस्कृतिक स्वामित्व की पुनस्र्थापना करने और बाढ़ नियंत्रण का एक नव प्रतिमान निर्मित करने की देशव्यापी मुहिम चलाये हुए है. इस मुहिम से जुड़े स्वयंसेवी बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, ओड़िशा इत्यादि राज्यों से न्यूनतम तकनीकी हस्तक्षेप के साथ बाढ़ मुक्ति आंदोलन का आयोजन करते हैं.

 

बेजोड़ उद्धरण क्षमता से ओत प्रोत नदी साहित्य -

मिश्र जी नितांत अनुसंधान के आधार पर नदियों के विषय में जनचेतना का बिगुल अपने लेखन द्वारा बजाते हैं. विभिन्न संस्थाओं, सामान्य जनता व सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा सराहा गया मिश्र जी का लेखन साहित्य सहज, सरल व भावपूर्ण भाषा से सम्पन्न तथा हिंदी, उर्दू, बिहारी, बंगला, ओडिया आदि भाषाओं से सुशोभित है. उनके द्वारा आलेखित किया गया लेखन कार्य निरंतर जनसाधारण को नदी तंत्र के प्रति अचंभित करता है. बंदिनी महानंदा (1994), बोया पेड़ बबूल का (2002), भुतही नदी और तकनीकी झाड़- फूक (2004), बगावत पर मजबूर मिथिला की कमला नदी (2005), दुई पाटन के बीच में (2006) तथा बागमती की सद्गति (2010) आदि उत्कृष्ट पुस्तकों के माध्यम से मिश्र जी ने नदियों की कहानी को कागज़ पर उतारा. इन सभी रचनाओं का अंग्रेजी रूपांतरण भी किया जा चुका है.

 

मिश्र जी की पुस्तक बोया पेड़ बबूल का को भारत के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के द्वारा पर्यावरण सम्बंधी उत्कृष्ट साहित्य के तौर पर सराहा गया. बाढ़ पर हो रही राजनीति का सटीक चित्रण इस पुस्तक के माध्यम से किया गया. इसके साथ ही आधुनिक बाढ़ नियंत्रण तकनीकों की सीमा पर भी ध्यान अंकित इस कृति द्वारा किया गया.

 
 “भारत में नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है और माँ केवल माँ है, वह संसाधन या शोक कभी नहीं हो सकती

 

भुतही नदी और तकनीकी झाड़-फूंक के अंतर्गत उन्होंने बिहार की भुतही बालान नामक नदी की स्थिति वर्णित करते हुए बताया कि किस प्रकार बाँध को लेकर नदी के पूर्व व पश्चिम इलाकों में मतभेद पसरा हुआ है. कोसी बाँध से घौगडिया निर्मल रेलवे लाइन को ऊँचा कर दिया गया था, जिससे इस नदी के प्रवाह और गाद पर बेहद प्रभाव पड़ा.

 
 “भारत में नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है और माँ केवल माँ है, वह संसाधन या शोक कभी नहीं हो सकती

 

बागमती की सद्गति पुस्तक के द्वारा मिश्र जी ने उस प्रत्येक विकल्प को विस्तारपूर्वक समझाया जो नदियों के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं व व्यक्तियों के दिशानिर्देशन में सहायक हो. इसके अंतर्गत मिश्र जी ने स्पष्ट किया कि बिहार राज्य का जल संसाधन विभाग असंगठित, लचर प्रबंधन, कर्मचारियों की अक्षमता के कारण बहुआयामी परियोजनाओं का क्रियान्वयन करने में असमर्थ है. यदि परम्पराओं व संस्कृति को तकनीक के साथ उपयोग किया जाए तो कोसी का विकास संभव है.

 
 “भारत में नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है और माँ केवल माँ है, वह संसाधन या शोक कभी नहीं हो सकती

 

दुई पाटन के बीच पुस्तक के माध्यम से बिहार का शोक कोसी नदी के पौराणिक, लौकिक व भौगोलिक गुणों को समेटते हुए कोसी के भारतीय भू भाग पर बाढ़ नियंत्रक प्रयासों से जुड़े प्रभावों का अध्ययन मिश्र जी द्वारा किया गया.मिश्र जी द्वारा कोसी नदी से जुड़े शोध में जल सम्बन्धी विषय पर आंकड़ों से जुड़े गोपनीयता नीति के बावजूद भी अथक प्रयास किया गया.विभिन्न लोकतान्त्रिक संस्थाओं में हुई बहस को साहित्य का माध्यम बनाया गया क्योंकि वह आम जनता के समक्ष की जाती है, सम्बंधित अधिकारियों, किसानों व विस्थापितों से वार्ता आदि के माध्यम से कोसी के दर्द को समझने का प्रयास किया है.

 
 “भारत में नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है और माँ केवल माँ है, वह संसाधन या शोक कभी नहीं हो सकती

नदी साहित्य में मिश्र जी की अद्भुत उदाहरण क्षमता मन योग्य है, राजनीतिज्ञों के स्वार्थ पर कटाक्ष करते हुए मिश्र जी बेहद सटीक शब्दों में कहते हैं कि,

“ अगर कुएं में ही भांग पड़ी हो तो फिर कौन किससे कहेगा कि तुम नशे में हो?"

 

भागीरथ प्रयास सम्मान से विभूषित –

जन चेतना के अग्रगण्य मिश्र जी न केवल नदियों की गरिमा को जीवंतता देने के पक्षधर हैं बल्कि तटीय इलाकों के निवासियों के लिए अदम्य साहस का प्रतीयमान भी बने हुए है. वर्ष 2016 में संदर्प संस्था द्वारा उन्हें भागीरथ प्रयास सम्मान से अलंकृत भी किया जा चुका है. एक सरित - कथाकार के रूप में सदियों पुरानी बाढ़ नियंत्रक व सिचाईं पद्धतियों का उद्भव करने तथा विभिन्न लोक कथाओं को अपने सवेंदनात्मक शब्दों में पिरोकर व्याख्यान करने वाले मिश्र जी जनता के लिए एक सर्वश्रेष्ठ जन चेतना का उदाहरण बने हुए हैं.

 
 “भारत में नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है और माँ केवल माँ है, वह संसाधन या शोक कभी नहीं हो सकती

How this page is edited — our standards

BallotBoxIndia is an AI-assisted pilot. Content here is reviewed by an editorial process against open, public journalistic standards and checked by human editors before it is featured. Every page is assessed for:

  • Verification — claims backed by public sources
  • Accuracy — names, dates and numbers checked
  • Fairness & neutrality — balanced, non-partisan, with a right of reply
  • Public interest — real development & governance, not promotion
  • Timeliness — current, with a last-reviewed date
  • Completeness — the actual substance, not filler
  • Transparency — sources, authorship and AI-assistance disclosed

Figures and generated text are pilot estimates and may contain errors. If something here is wrong or unfair, we honour corrections and right of reply — contact editors@ballotboxindia.com.

Is this you, or someone you work with?

Contribution here is earned through action research and verified milestones — not bought. Add your work, or request a correction to what's shown.

Get on the record →