पानी रे पानी : तेरा समाधान क्या
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समाज एवं राष्ट्र, जहाँ लोग कुछ समय अपनी संस्कृति, सभ्यता, अधिकारों और जिम्मेदारियों को समझने एवं सँवारने में लगाते हैं। एक सोची समझी, जानी बूझी आवाज़ और समझ रखते हैं। वही देश संसार में विशिष्टता और प्रभुत्व स्थापित कर पाते हैं।
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By
Raman Kant 40
यह परम सत्य है कि इस जगत के हर एक प्राणी के लिए पानी ही जीवन का आधार है. वर्तमान समय में पानी में बढ़ते प्रदूषण के कारण 80 प्रतिशत बीमारियां जल-जनित होने लगी हैं. विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार विश्व में प्रति वर्ष 50 लाख लोग जल जनित बीमारियों के कारण काल का ग्रास बनते हैं. सूखे ने विकराल रूप इख़्तियार कर लिया है. पानी न मिलने के कारण लोग पलायन के लिए मजबूर हैं. कुछ परिवार पानी या मौत मांग रहे हैं. पिछले वर्ष जहां भारत का पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण शहर शिमला पानी की कमी से जूझता दिखा तो वहीं दक्षिण अफ्रीका का सम्पन्न शहर केपटान का पानी समाप्त होने पर वहां आपातकाल जैसे हालात बन गए थे.
इस समय भारत सहित विश्व के अधिकतर देशों के सामने पानी से संबंधित दो समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं. पहली पानी की कमी व दूसरी उसका प्रदूषण. भूजल प्रदूषण के कारणों में बेलगाम उद्योगों का तरल गैर-शोधित कचरा, बेतरतीब कस्बों यशों का गैर-शोधित तरल कचरा प्रमुख हैं. उद्योगों व शहर-कस्बों ने नदियों को प्रदूषित किया और नदियों ने भूजल को. यही कारण रहा कि जो समाज कभी शीलत-निर्मल जल की अधिकता के कारण नदियों के किनारे बसा पला-बना और विकसित हुआ. वह आज वहां से उजड़ने के कगार पर खड़ा है.
कड़वी सच्चाई है कि पानी का अगर हम प्राकृतिक संरक्षण बनाए रखते, बना लें या फिर बनाए रखने का प्रयास करें तो हमें पानी की कमी शायद ही खले. हमारी गलतियों का ही परिणाम है कि देश के कुछ क्षेत्रों में भू-जल का स्तर 1500 फीट की गहराई तक खिसक चुका है. आधुनिकीकरण के नाम पर विकसित हुए गुरुग्राम का भूजल स्तर पिछले 20 वर्षों में 16 मीटर नीचे खिसक चुका है तथा प्रतिवर्ष डेढ़ मीटर की दर से गिरता जा रहा है.
गंगा व यमुना के बीच बसा पश्चिमी उत्तर प्रदेश भी आज पानी की कमी से जूझ रहा है. देश की राजधानी दिल्ली में 21वीं शताब्दी की सब कुछ वस्तुएं उपलब्ध हैं लेकिन पीने के लिए अपना पानी नहीं है. दिल्ली प्यास बुझाने के लिए उत्तर प्रदेश व हरियाणा से पानी मांग रही है. पानी को संग्रहित करने के पुराने तौर-तरीके तालाब, जौहड़, बावड़ी, कुन्डी, आहर पाइन व झीलें आदि हमने स्वार्थवश समाप्त कर दिए हैं.
भारत सरकार ने वर्ष 2024 तक देश के प्रत्येक परिवार को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया है. इसके लिए स्थानीय समाधान खोजना होगा क्योंकि जिस गति से बड़ी नदियों में पानी कम हो रहा है, उससे संभव नहीं लगता कि सभी को नदियों या नहरों से पानी पहुंचाया जा सकेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्षा जल संरक्षण की अपील की है. यही एक मात्र समाधान है. इससे ही भूजल स्तर में बढ़ोतरी होगी और भूजल प्रदूषण भी धीरे-धीरे कम होगा.