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धर्म विरोधी हिंसा को रोकने के लिए श्रीलंकन सरकार ने फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप पर लगाया प्रतिबन्ध

Fake Information on Facebook – Broken democracies and Criminal Culpability on Facebook Owners, a Research

Fake Information on Facebook – Broken democracies and Criminal Culpability on Facebook Owners, a Research विदेशों में सोशल मीडिया का बढ़ता हस्तक्षेप- डेटा संप्रभुता पर खतरा

ByDeepika Chaudhary Deepika Chaudhary   Contributors Swarntabh Kumar Swarntabh Kumar 53

वर्चुअल वर्ल्ड वर्तमान में विश्व के कोने कोने तक अपनी पहुंच बनाए हुए है. संचार का विशाल नेटवर्क बनाम सोशल मीडिया जिस द्रुत गति से सूचनाओं का आदान प्रदान करता है, उससे विश्व की राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक यहां तक कि मनोवैज्ञानिक परिस्थितियां पल में करवट ले लेती हैं. परन्तु हाल फिलहाल जिस प्रकार सोशल मीडिया की भ्रामक खबरें विभिन्न देशों में उथल-पुथल मचा रही है, यह अत्यंत गम्भीर मुद्दा बनता जा रहा है. सोशल साइट्स के माध्यम से सूचनाओं को तोड़ मरोड़ कर परोसा जाना दुनिया भर की सरकारों को सकते में डाल रहा है. मार्च 2018 में हुए एक सर्वे के अनुसार 69% सोशल मीडिया यूजर्स ने माना कि फेसबुक आदि द्वारा अफवाहों को रोकने के लिए उचित प्रयास नही किये जा रहे हैं.

मार्च के शुरुआती सप्ताह में श्रीलंका में फैले साम्प्रदायिक दंगों को हवा देने वाले फेसबुक पोस्ट्स भारी मात्रा में शेयर किये गये, जिस कारण देश में आपातकाल घोषित करना पड़ा. गौरतलब है कि 21 मिलियन की आबादी वाले देश श्रीलंका में 9 फ़ीसदी हिस्सा मुस्लिम आबादी व 13% तमिल हिंदु है तथा बौद्ध सिंघली 70 प्रतिशत घनत्व के साथ देश की अधिकतम जनसंख्या को छायांकित करते हैं. देश की तकरीबन 6 मिलियन जनसंख्या फेसबुक उपयोगकर्ता हैं, जिससे साफ़ होता है कि फेसबुक का प्रभाव श्रीलंका में बहुतायत है. देश की पहाड़ी राजधानी एवं लोकप्रिय पर्यटन स्थल कैंडी में मुस्लिम और बौद्धों के बीच हुई साम्प्रदायिक हिंसा के कारण जानमाल का नुकसान उठाने के बाद एहतियाती तौर पर श्रीलंका की सरकार द्वारा फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम आदि इंटरनेट सेवाओं पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी गयी. 

श्रीलंका के सूचना प्रसारण मंत्री हर्लिन फ़र्नांडो ने सोशल मीडिया यूजर के एक ट्वीट को हाईलाइट करते हुए दावा किया कि फेसबुक उतनी तेजी से प्रक्रिया नहीं दे रहा जितनी प्रतिक्रिया की उम्मीद समाज कर रहा है. फेसबुक द्वारा फ्लैगड़ पोस्ट्स की समीक्षा करने, यहां तक कि आपतिजनक फेसबुक पेज हटाने में भी काफी समय लिया गया.

वर्चुअल वर्ल्ड वर्तमान में विश्व के कोने कोने तक अपनी पहुंच बनाए हुए है. संचार का विशाल नेटवर्क बनाम

उक्त फेसबुक उपयोगकर्ता द्वारा अपना नाम उजागर न किये जाने की शर्त पर बताया गया कि सिंघल भाषा में एक धर्म विरोधी भड़काऊ पोस्ट की शिकायत करने पर 6 दिन बाद उसे जवाब मिला कि उस विशिष्ट पोस्ट द्वारा फेसबुक के मानकों का उल्लंघन नहीं किया गया है.

वर्चुअल वर्ल्ड वर्तमान में विश्व के कोने कोने तक अपनी पहुंच बनाए हुए है. संचार का विशाल नेटवर्क बनाम

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श्रीलंका के राष्ट्रपति मेथिरिपाल सिरीसेना ने एक इंटरव्यू के दौरान स्पष्ट किया कि देश में बढ़ते दंगो का मुख्य कारण सोशल मीडिया है. उन्होंने कहा कि चरमपंथी समूह बेहद गलत तरीके से सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे थे, यही कारण है कि हमें इनके उपयोग को सीमित करना पड़ा. 

वहीं श्रीलंका के राष्ट्रीय सहअस्तित्व एवं आधिकारिक भाषा मंत्री मनो गणेशन द्वारा भी ट्वीट के माध्यम से सुनिश्चित किया गया कि सरकार ने सामुदायिक द्वेष से भरी पोस्ट्स पर रोक लगाने एवं साम्प्रदायिक हिंसा को कम करने के लिए अस्थायी रूप से सोशल मीडिया के उपक्रमों पर रोक लगा दी है. 

वर्चुअल वर्ल्ड वर्तमान में विश्व के कोने कोने तक अपनी पहुंच बनाए हुए है. संचार का विशाल नेटवर्क बनाम 

केवल यही नहीं चरमपंथी नेता अमिथ वीरसिंघे, जिन्हें हिंसा को बढ़ावा देने में मदद करने के आरोप में कैंडी पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया ; उन्होंने अपने फेसबुक पेज के माध्यम से हिंसक पोस्ट कर के लगभग डेढ़ लाख फोलोअर्स को एकत्रित कर लिया था. अन्य चरमपंथी समूह जैसे बोदू बाल सेना (BBS) तथा सिंघल रवाया भी द्वेषपूर्ण भाषणों के माध्यम से इसी श्रेणी में सम्मिल्लित होते हैं. अम्पिती सुमनाराथान थेरो, जो एक कठोर बौद्ध भिक्षु के तौर पर श्रीलंका में जाने जाते हैं, उनके फेसबुक पर तकरीबन 40,000 अनुयायी हैं तथा 6 मार्च को अपने फेसबुक पोस्ट के जरिये सिंघल समुदाय को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए पक्षपातपूर्ण रवैये को लेकर सरकार पर कटाक्ष किया. इसके साथ ही एक फेसबुक ग्रुप सिंघल बुद्धिस्ट, जिसके लगभग 8 लाख फोलोवर्स हैं, ब्लॉक के तुरंत बाद से अपडेट पोस्ट किये, जिनमे दावा किया गया कि सरकार द्वारा दंगो का भुगतान किया गया था, इस प्रकार के पोस्ट्स ने देश में अस्थिरता का माहौल उत्पन्न किया.

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वर्चुअल वर्ल्ड वर्तमान में विश्व के कोने कोने तक अपनी पहुंच बनाए हुए है. संचार का विशाल नेटवर्क बनाम

इस प्रकार के हिंसक उपद्रवों के कारण श्रीलंका समेत तमाम दक्षिण एशियाई देशों में फेसबुक की नैतिक जिम्मेदारी व विभिन्न भाषाओँ वाले कंटेंट को मॉनिटर कर सकने की योग्यता को लेकर प्रश्नचिंह खड़े होने लगे है. यूनाइटेड नेशन के जांचकर्ताओं द्वारा भी कहा गया कि रोहिंग्या मुस्लिम दंगों में फेसबुक की भूमिका काफी बड़ी थी .

यूएन जांचकर्ता यांगही ली ने टिपण्णी की , “मुझे डर है कि फेसबुक अब एक जानवर के रूप में परिवर्तित हो चुका है, जो अब उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पा रहा, जिसके लिए यह निर्मित हुआ था.”
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कोलंबो के नीति विकल्प केंद्र (CPA) के एक विश्लेषक संजाना हत्तोतुवा द्वारा कहा गया कि, देश में मुस्लिम विरोधी भावनाओं का ऑनलाइन प्रकटीकरण काफी क्रूर, कठोर व जहरीला है. यह समस्या कई वर्षों से सर उठाए हुए है लेकिन सरकार इसे लेकर अब गंभीर हुई है. इसके अतिरिक्त उन्होंने श्रीलंकन समाज की उच्च शिक्षण व्यवस्था के अंतर्गत लचर सूचना साक्षरता की आलोचना करते हुए कहा कि, “श्रीलंकन जनसंख्या उच्च शिक्षित तो है परन्तु सोशल मीडिया से जुड़ी सूचनाओं पर तत्क्षण यकीन और हिंसक प्रतिक्रिया देना खराब साक्षरता व्यवस्था की ओर इशारा करता है.”

 

केवल श्रीलंका ही नहीं बल्कि बहुत से देशों में फेसबुक पोस्ट्स के कारण फैली राजनीतिक अस्थिरता, असामाजिकता तथा धार्मिक द्वेषों के चलते कई बार फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, इन्स्टाग्राम इत्यादि सोशल साइट्स पर रोक लगाई गयी है. भारत में कश्मीर घाटी के अंतर्गत आतंकवादी वारदातों के बढ़ने पर कर्फ्यू के हालातों में वर्ष 2017 में फेसबुक पर रोक लगी, चीन द्वारा जुलाई 2009 में उरुमकी दंगों के दौरान शिनजियांग स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं को नफरत भरे भाषण फेसबुक के माध्यम से फैलाने से रोकने के लिए देश के कई हिस्सों में फेसबुक पर रोक लगाई गयी, 2011 के मलेशियन विद्रोह के दौरान अस्थायी रूप से फेसबुक पर बैन लगाया गया, मई 2016 में विएतनामी सरकार द्वारा भिन्नमतावलम्बी विद्रोहियों को रोकने के लिए दो हफ्ते के लिए फेसबुक बंद कर दी गयी. तात्पर्य स्पष्ट है कि विभिन्न सरकारों द्वारा समय समय पर फेसबुक जैसी साइट्स को बैन किया जाता रहा है.   

कहा जा सकता है कि जिस प्रकार घृणास्पद समभाषण का ऑनलाइन खेल वर्तमान में सर उठाए हुए है, वह कहीं न कहीं युवाओं को कट्टरपंथ की और आकर्षित करने में पहल कर रहा है. अनगिनत देश जहां आज लोकतंत्र की सार्थकता बनाए रखने के अथक प्रयास कर रहें है वहीं नफरत उगलने के सबसे बड़े माध्यम के रूप में फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के प्रारूप अपनी पकड़ को और अधिक गहरा कर रहे है. सरकारें एक सीमित समय के लिए भले ही इन माध्यमों पर रोक लगा दे परन्तु इनके जरिये लोगों के मन में फैल रही क्रूरता, पाशविकता, उग्र व्यवहार की मानसिकता को किस प्रकार अवरुद्ध किया जा सकता है, यह निश्चित तौर पर मनन योग्य विषय है.   

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