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सोशल मीडिया और समाज

ByMohd. Irshad Saifi Mohd. Irshad Saifi   Contributors Amit Kumar Yadav Amit Kumar Yadav {{descmodel.currdesc.readstats }}

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इंटरनेट क्रांति के दौर में सोशल मीडिया का इस्तेमाल लोगों के स्टेटस सिम्बल के साथ-साथ दैनिक आवश्यकता का आकार ले चुका है। मीडिया एक ऐसा क्षेत्र है जहां तथ्यों के आधार पर सही-गलत का फर्क बताने का कार्य करता रहा है और समाज उसी के अनुसार विभिन्न मुद्दों पर निर्णय करता है। कुछ समय पहले तक यह पेशा बेहद सम्माननीय भी रहा है, किन्तु हाल के दिनों में इसमें जबरदस्त गिरावट दर्ज की गयी है। आपको नहीं लगता कि आज मीड़िया को कुछ लोगों द्वारा नचाया जा रहा है। सिर्फ समस्याओं से जूझना हो तो चल जाये लेकिन अब यह मुश्किल यहां तक पहुंच गई है कि टीआरपी के खेल में उलझकर प्रेस, मीडिया जैसे शब्द गायब होने के कगार पर आ पहुंचे हैं और उसकी जगह ले ली है कॉर्पोरेट प्रतिद्वंदिता ने! 

अब सवाल यह है कि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रुप में जानी वाली मीडिया आज के दौर में क्या वाकई चौथे स्तम्भ के रुप में जानी जा रही है। इस पर अब विचार की आवश्यकता है। 

इस बात को हम मना नही कर सकते हैं  कि इंटरनेट क्रांति के इस दौर में सोशल मीडिया ने हमे ऐसे  माध्यम दिये हैं  कि हम अपनी बात को पूरे देश के सामने आसानी से रख सकते हैं। सोशल मीडिया के इन प्लेटफॉर्म्स ने विभिन्न अवसरों पर अपने महत्त्व को साबित भी किया है, चाहे देशी चुनाव हो अथवा विदेशी धरती पर कोई आंदोलन हो या फिर पर्सनल ब्रांडिंग ही क्यों न हो आज लाइक्स, फालोवर्स, शेयर जैसे शब्द हर एक जुबान पर छाये हुए हैं। 

अरविन्द केजरीवाल द्वारा गठित पार्टी ने दिल्ली राज्य के बहुचर्चित चुनाव में 80 फीसदी कैम्पेन सोशल मीडिया के माध्यम से ही किया और इसका परिणाम दुनिया ने देखा। व्यक्तिगत ब्रांडिंग के लिए भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल नेताओं, खिलाडियों, अभिनेताओं द्वारा धड़ल्ले से किया जा रहा है आप चाहे गाँव में ही क्यों न हों आपको तमाम नवयुवक अपने फेसबुक और जुड़े मित्रों से सम्बंधित गतिविधियाँ शेयर करते नजर आएंगे, पर इन सकारात्मक दृश्यों के पीछे एक कड़वी परत भी दिखती है। जिसमें सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल भी उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है। मुजफ्फरनगर में पिछले दिनों हुए दंगों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल की खबरें बड़ी तेजी से फैली थीं तो जम्मू कश्मीर में भी आये दिन इस तरह की खबरें देखने को मिलती ही रहती हैं इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों में नफरत भरे संदेशों को सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाया जा रहा है। कई बार इरादतन और संगठित रूप में तो कई बार बहकावे में युवक युवतियां ऐसे कदम उठा देते हैं जो उनकी गिरफ्तारी तक जा पहुँचता है। हालाँकि इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय जिसमें तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गयी है। उससे इन माध्यमों का गलत इस्तेमाल करने वालों द्वारा फायदा उठाने की सम्भावना भी बढ़ सकती है। 

शायद हमें सोशल मीडिया का असली उद्देश्य समझने की जरुरत है और उसके सही प्रयोग की दिशा में हम एक कदम बढ़ायेँ तो सफल होंगें। आखिर सोशल मीडिया को विवादित बनाने में आम आदमी ही नहीं बल्कि नेताओं, खिलाडियों, अभिनेताओं द्वारा इसका प्रयोग किया जा रहा है। 

ऐसा नहीं है कि किसी के पास कोई खबर नहीं है, सही-गलत परखने वाले लोग नहीं है, खबरों की तह तक पहुँचने के रिसोर्सेस नहीं हैं, स्टोरी लिखने वाले कलमकार नहीं हैं .... बल्कि यह सब तो पहले से काफी ज्यादा मात्रा में उपलब्ध हैं पर आज, लेकिन यह सारी रिसोर्सेस बजाय की पत्रकारिता करने के, सिर्फ और सिर्फ व्यावसायिक हित साधने के काम में लाई जा रही हैं। निश्चित रूप से थोड़ा बहुत पत्रकारिता भी इस बीच आटोमेटिक तरीके से हो जाती है, लेकिन पत्रकारिता करते कितने लोग हैं कई संपादकों, पत्रकारों ने अपनी दलीलों की आवाज ऊंची की और दूसरों पर जमकर हमला बोला. ये तीखापन और तंज इसलिए भी खतरनाक माना जाना चाहिए क्योंकि एक बड़े चौनल एनडीटीवी ने अपनी टेलीविजन की स्क्रीन काली की, मगर यह स्क्रीन काली किसी सरकार या प्रशासन के विरोध में नहीं की गयी, बल्कि यह मीडिया के खिलाफ ही स्क्रीन काली हुई थी। 

आपको गायक अभिजीत भट्टाचार्य का वह विवादित ट्वीट तो याद ही होगा जिसमें उन्होंने गरीब आदमी को कुत्ता कहते हुए ट्विटर पर लिखा कि कुत्ता सड़क पर सोयेगा तो मरेगा ही सड़क गरीब के बाप की नहीं है वह बिचारे सलमान खान की चापलूसी या समर्थन कर रहे थे। लेकिन ट्विटर को खामख्वाह बदनाम कर गए। इसके अतिरिक्त देश से फरार पूर्व क्रिकेट प्रशासक ललित मोदी के ट्वीट्स ने देश की राजनीति में उथल-पुथल मचा रखी है, कहने का तात्पर्य यह है कि हम आज भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल विवाद फैलाने में या अपनी कुंठित सोच को जाहिर करने में करते हैं। मगर हमें उन लोगों से प्रेरणा लेने में जाने क्यों संकोच हो जाता है। जो बेहतरीन नेटवर्किंग और ब्रांडिंग में इन प्लेटफॉर्म्स का बेहतरीन उपयोग करते नजर आते हैं। हजारों ऐसे अखबार और मीडिया संस्थान हैं जो पैसा नहीं कमाते लेकिन उनके मालिक उन्हें बेचते नहीं क्योंकि ये रसूख जमाने और वसूली के हथियार बन चुके हैं।

अब लोकतंत्र की उस स्थिति की कल्पना कर लीजिये, जब संस्थागत मीडिया संस्थान पूर्ण व्यवसायिकता और टीआरपी गेम में डूबे हों, स्वतंत्र लोग बैक डोर से तमाम एजेंसियों द्वारा नियंत्रित होने की कगार पर हों, सोशल मीडिया की आवाज को भीड़ कहकर खारिज कर दिया जाता हो, जो थोड़ा बहुत बचे लोग हैं उन्हें सीधे तौर पर दलाल माना जा रहा हो, ऐसे में आपको रौशनी की बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं दिखती, सिवाय इसके कि जनता इन मामलों में नीर-क्षीर का विवेक तेजी से विकसित करे और इंटरनेट के इस युग में यह इतना मुश्किल भी नहीं है. हाँ! इसे संगठित और सजग रूप लेने में समय अवश्य लग सकता है, किन्तु मीडिया का भविष्य  तो इसी ओर जायेगा। 

सोशल मीडिया के माध्यम से ब्लॉग तस्वीर पोस्ट ट्वीट इत्यादि शब्दावलियाँ कितनी ताकतवर हो सकती हैं हम इन उदाहरणों से समझ सकते हैं। व्हाट्सऐप फेसबुक और ट्विटर पर गाली.गलौच करने वाले हमारे देश के युवा क्या बेहतरीन ब्लॉगर बनकर सूचना के संसार में अपनी जगह  बना सकते हैं? इन माध्यमों पर बौद्धिक विलास करने वाले बुद्धिजीवियों से पूछा जाना चाहिए कि वह खुद इस माध्यम पर मात्र पार्टीबाजी ही करते हैं अथवा युथ के लिए कुछ इंस्पिरेशन छोड़ने में सक्षम हो पाते हैं? समस्या सोच बदलने की है जिससे सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म्स हमारे लिए वाकई बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं जरूरत है इसकी उपयोगिता समझने की और इसको अपने जीवन में उपयोगी तरीके से ढालने की और इसके लिए नकारात्मकता हमें छोड़नी ही होगी क्योंकि इसके सिवा और कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

धन्यवाद - मौ. इरशाद सैफी 

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