
बिग बिलियन डे, ग्रेट इंडियन फेस्टिवल सेल जैसे बंपर छूट का मायाजाल जो वास्तव में है ही नहीं
कहानी एक ऐसी सोच की जिससे खुद ही हारते गये हम. हमारे उस लोभ और लालच की जहां हमें सब कुछ कम में चाहिए. फ्री में मिल जाये तो उससे बेहतर और कुछ हो ही नहीं सकता. वैसे फ्री के लोभ में तो हम यहां किसी को चुनाव तक में ऐतिहासिक जीत तक दिलवा देते हैं. रेलवे बजट में किराया नहीं बढ़ना, बजट के बेहतर होने का प्रमाण होता है. बिग बिलियन डे के नाम पर बड़े-बड़े छूट के रुप में हमारे सामने चारा डाला जाता है और हम बड़ी आसानी से इसमें फंस भी जाते हैं. विज्ञापनों के मायाजाल में उलझ कर रह जाते हैं. मगर इसका भुगतान भी हम ही करते हैं और वर्षों से करते रहे हैं.
खैर, आपको एक कहानी बतानी है.
वैसी ही जिसे आप बचपन में पढ़ा करते थे बहुत पहले की बात है के जैसी. भारत में एक समय लोग चक्की का आटा खाया करते थे. पैकेट में बिकने वाले आटे की तो तब कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. तब भारत आधुनिक होने की ओर बढ़ रहा था और आज भी है. लेकिन तभी कुछ ऐसा होता है कि अचानक से बड़ी विदेशी कंपनियों की नज़र इस ओर जाती है. अथाह पूंजी पर बैठी इन कंपनियों को भी पता था कि चक्की वाले ये दुकानदार उनके कपट और पूंजी के आगे टिक नहीं पायेंगे. इससे भी ज्यादा उन्हें यह ज्ञात था कि उनके दिये लालच का हम दोनों हाथों से स्वागत करेंगे. हुआ भी ठीक ऐसा ही.
चक्की वाले आटे के साथ बाजार में पैकेट वाला आटा भी उपलब्ध था, वह भी कम मूल्य पर.
ग्राहकों के सामने लालच परोसा गया उन्होंने इसे स्वाद के साथ खाया. चक्की वालों के पास कोई विकल्प नहीं था, पूंजीपतियों के सामने टिकना बहुत मुश्किल हो रहा था. अपने लागत से कम पर बेचने की न तो उनके पास क्षमता थी न ही हैसियत. उधर इन पूंजीपतियों को भी पता था कि वह लागत से कम पर कुछ साल नुकसान के साथ भी आटा बेच सकते हैं मगर ये चक्की वाले नहीं और एक बार चक्की बंद हो गई तो बाजार में उनका एकाधिकार होने के कारण वह कीमत अपने हिसाब से तय कर सकते हैं. सब कुछ वैसा ही हुआ. ग्राहक लोभ के कारण पैकेट वाला आटा लेने लगे. चक्की वाले मूल्य कम नहीं कर सकते थे, ग्राहक उनसे छिन गए और नुकसान होने के कारण उन्हें अपनी चक्की मील बंद करनी पड़ी. अब सारा बाजार पैकेट वालों का था, पूरा एकाधिकार उनका. कीमत उनके हिसाब से तय हो सकती थी और हुआ भी वैसा ही.
अब तक के घाटे की भरपाई के लिए सारा बाजार उनका था, कीमत उनकी थी.
चक्की वालों के समय जो मूल्य कुछ पैसे और वह भी बहुत सालों बाद बढ़ा करते थे वह अब कुछ दिनों में रुपयों के हिसाब से बढ़ने लगे. हमारे लोभ ने आखिर हमें ही डस लिया. कम में पाने की लालच के कारण हम से मनमाने दाम वसूले जाने लगे और हमारे पास कोई चारा भी नहीं बचा. चक्की वालों की दुर्दशा तो हुई ही साथ ही हमें भी दूर रखी हड्डी ही मिली. आखिर कहावत गढ़ने वाले देश में हम यह कैसे भूल जाते हैं कि यहां तो फ्री में मैल भी नहीं मिलता.
ऐसी है हमारे लोभ की कहानी.
यह तो बस एक ही कहानी थी, ऐसी कई और कहानियां हैं जिसे हमने ही बुना है. अपने ही लालच में हम फंसते गए हैं, हमें भी दाना देकर चिड़ियों की तरह फंसाया गया है. ऐसी ही कई और कहानियां आने वाली पीढ़ी को सुनाई जायेंगी. आज ऐसी ही कई और कहानियां हमारे साथ-साथ चल रही है. ई-कॉमर्स एक बेहतरीन उदाहरण है जो हमारे सामने सोने के मृग की तरह छोड़ा गया है. यह हमारे सामने फैलाया गया बेहतरीन जाल है जिसमें हम खुद फंसने को बढ़ते जा रहे हैं. हमारे सामने छूट का बड़ा सा दाना फेंका जा रहा है जो असल में है ही नहीं. बिग बिलियन डे, ग्रेट इंडियन फेस्टिवल और बंपर छूट ने हमारे सामने मायाजाल डाल रखा है, हमारे फ्री की चाहत को हमसे वसूला जा रहा है. आने वाले दशकों का परिणाम भी चक्की मीलों जैसा होना है, जहां छोटे दुकानदारों की जगह इन ई-कॉमर्स वालों का एकाधिकार होगा. इनके ही मनमाने मूल्य होंगे और हमारे ठगे जाने की एक और कहानी. वैसे भी हमारे यहां किस्सागोई की तो कोई कमी है नहीं.
- स्वर्णताभ
संपादकीय टिपण्णी - (१०-११-२०१८)
बिग बिलियन डे का खेल वही है जो पिछले दिनों स्वच्छ भारत कारोबार से जुड़े एन.डी.टी.वी. क्लीनएथान का था

नदी स्वास्थ्य से जुड़े लोगों ने काफी जोर शोर से लाइव कैमरे पर सफाई की. जाने माने सामाजिक कार्यकर्ताओं ने माना भी की कल जब कैमरा नहीं होगा तो भीड़ होगी की नहीं कहना मुस्किल है. ये अभियान बिलकुल बिग बिलियन डे के छलावे सा ही है. हमारे दो सवाल.
१. इनकी सुन कर अगर कुछ लोगों ने महीने में एक डब्बा डेटोल से ज्यादा हाँथ धो लिए तो कितना डिटर्जेंट नदियों में जाएगा?
२. अमिताभ जी ने जो बिग बिलियन डेज वाले अमेज़न का कचरा भारत में भरा, तो इसका असर हमारी नदियों में बहते कचरे, लोगों के स्वास्थ्य, समाज के डंप यार्ड पर कितना पड़ा. टेक्सास अमेरिका वाले इनके मित्रों के लिए कमाई कर के अमेरिका तो ग्रेट बना दिया, १२ घंटे में अमिताभ जी ने क्या भारत से भी ये सब साफ़ करवा दिया?

आज भारत का बिग बिलियन डे और स्वच्छ भारत अभियान इन्ही विसंगतियों से भरा हुआ है. अमिताभ बच्चन कभी ये भी सोचें. कहीं आपके महा-पी. आर. के चक्कर में आम भुक्तभोगी जन भी अब क्या सिर्फ कैमरा के सामने ही सफाई करते हैं?
नोट - सन्दर्भ इकोनॉमिक्स का सिद्धांत है जिसे डिमांड और सप्लाई ग्राफ कहते हैं. डिमांड कृतिम रूप से बढ़ाने का एक तरीका मूल्य कम कर देना होता है, या/और मार्केटिंग उन्माद फैलाना होता है , जिससे अति उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिलता है. हमारा ये मानना है की हर वस्तु का मूल्य उसके कार्बन फुटप्रिंट( उत्पादन से डिस्पोजल तक) यानि उसका ग्रीन कास्ट, के अनुसार हो, समाज पर उसका असर क्या हो रहा है इसको भी ध्यान रखा जाए, जैसे गूगल और चाइना के ट्रैकर लगे सस्ते फ़ोन, जो कुछ महीनों में विषैला कचरा हो जाते हैं, की असल कीमत, ग्रीन और ह्यूमन कास्ट मिला कर क्या होगी? . इकोनॉमिक्स में भी सब्सिडी और डिस्काउंट इत्यादि को सही नहीं कहा गया है, मगर बड़ी कंपनियां मार्किट कब्जाने और लत लगाने के लिए ये कार्य आजकल खुल्ले आम कर रही हैं और बड़े बड़े लोग खुल कर इसमें शामिल होते दिखाई देते हैं.
By
Swarntabh Kumar Contributors
Rakesh Prasad 193
बिग बिलियन डे, ग्रेट इंडियन फेस्टिवल सेल जैसे बंपर छूट का मायाजाल जो वास्तव में है ही नहीं
खैर, आपको एक कहानी बतानी है.
वैसी ही जिसे आप बचपन में पढ़ा करते थे बहुत पहले की बात है के जैसी. भारत में एक समय लोग चक्की का आटा खाया करते थे. पैकेट में बिकने वाले आटे की तो तब कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. तब भारत आधुनिक होने की ओर बढ़ रहा था और आज भी है. लेकिन तभी कुछ ऐसा होता है कि अचानक से बड़ी विदेशी कंपनियों की नज़र इस ओर जाती है. अथाह पूंजी पर बैठी इन कंपनियों को भी पता था कि चक्की वाले ये दुकानदार उनके कपट और पूंजी के आगे टिक नहीं पायेंगे. इससे भी ज्यादा उन्हें यह ज्ञात था कि उनके दिये लालच का हम दोनों हाथों से स्वागत करेंगे. हुआ भी ठीक ऐसा ही.
चक्की वाले आटे के साथ बाजार में पैकेट वाला आटा भी उपलब्ध था, वह भी कम मूल्य पर.
ग्राहकों के सामने लालच परोसा गया उन्होंने इसे स्वाद के साथ खाया. चक्की वालों के पास कोई विकल्प नहीं था, पूंजीपतियों के सामने टिकना बहुत मुश्किल हो रहा था. अपने लागत से कम पर बेचने की न तो उनके पास क्षमता थी न ही हैसियत. उधर इन पूंजीपतियों को भी पता था कि वह लागत से कम पर कुछ साल नुकसान के साथ भी आटा बेच सकते हैं मगर ये चक्की वाले नहीं और एक बार चक्की बंद हो गई तो बाजार में उनका एकाधिकार होने के कारण वह कीमत अपने हिसाब से तय कर सकते हैं. सब कुछ वैसा ही हुआ. ग्राहक लोभ के कारण पैकेट वाला आटा लेने लगे. चक्की वाले मूल्य कम नहीं कर सकते थे, ग्राहक उनसे छिन गए और नुकसान होने के कारण उन्हें अपनी चक्की मील बंद करनी पड़ी. अब सारा बाजार पैकेट वालों का था, पूरा एकाधिकार उनका. कीमत उनके हिसाब से तय हो सकती थी और हुआ भी वैसा ही.
अब तक के घाटे की भरपाई के लिए सारा बाजार उनका था, कीमत उनकी थी.
चक्की वालों के समय जो मूल्य कुछ पैसे और वह भी बहुत सालों बाद बढ़ा करते थे वह अब कुछ दिनों में रुपयों के हिसाब से बढ़ने लगे. हमारे लोभ ने आखिर हमें ही डस लिया. कम में पाने की लालच के कारण हम से मनमाने दाम वसूले जाने लगे और हमारे पास कोई चारा भी नहीं बचा. चक्की वालों की दुर्दशा तो हुई ही साथ ही हमें भी दूर रखी हड्डी ही मिली. आखिर कहावत गढ़ने वाले देश में हम यह कैसे भूल जाते हैं कि यहां तो फ्री में मैल भी नहीं मिलता.
ऐसी है हमारे लोभ की कहानी.
यह तो बस एक ही कहानी थी, ऐसी कई और कहानियां हैं जिसे हमने ही बुना है. अपने ही लालच में हम फंसते गए हैं, हमें भी दाना देकर चिड़ियों की तरह फंसाया गया है. ऐसी ही कई और कहानियां आने वाली पीढ़ी को सुनाई जायेंगी. आज ऐसी ही कई और कहानियां हमारे साथ-साथ चल रही है. ई-कॉमर्स एक बेहतरीन उदाहरण है जो हमारे सामने सोने के मृग की तरह छोड़ा गया है. यह हमारे सामने फैलाया गया बेहतरीन जाल है जिसमें हम खुद फंसने को बढ़ते जा रहे हैं. हमारे सामने छूट का बड़ा सा दाना फेंका जा रहा है जो असल में है ही नहीं. बिग बिलियन डे, ग्रेट इंडियन फेस्टिवल और बंपर छूट ने हमारे सामने मायाजाल डाल रखा है, हमारे फ्री की चाहत को हमसे वसूला जा रहा है. आने वाले दशकों का परिणाम भी चक्की मीलों जैसा होना है, जहां छोटे दुकानदारों की जगह इन ई-कॉमर्स वालों का एकाधिकार होगा. इनके ही मनमाने मूल्य होंगे और हमारे ठगे जाने की एक और कहानी. वैसे भी हमारे यहां किस्सागोई की तो कोई कमी है नहीं.
- स्वर्णताभ
संपादकीय टिपण्णी - (१०-११-२०१८)
बिग बिलियन डे का खेल वही है जो पिछले दिनों स्वच्छ भारत कारोबार से जुड़े एन.डी.टी.वी. क्लीनएथान का था
नदी स्वास्थ्य से जुड़े लोगों ने काफी जोर शोर से लाइव कैमरे पर सफाई की. जाने माने सामाजिक कार्यकर्ताओं ने माना भी की कल जब कैमरा नहीं होगा तो भीड़ होगी की नहीं कहना मुस्किल है. ये अभियान बिलकुल बिग बिलियन डे के छलावे सा ही है. हमारे दो सवाल.
१. इनकी सुन कर अगर कुछ लोगों ने महीने में एक डब्बा डेटोल से ज्यादा हाँथ धो लिए तो कितना डिटर्जेंट नदियों में जाएगा?
२. अमिताभ जी ने जो बिग बिलियन डेज वाले अमेज़न का कचरा भारत में भरा, तो इसका असर हमारी नदियों में बहते कचरे, लोगों के स्वास्थ्य, समाज के डंप यार्ड पर कितना पड़ा. टेक्सास अमेरिका वाले इनके मित्रों के लिए कमाई कर के अमेरिका तो ग्रेट बना दिया, १२ घंटे में अमिताभ जी ने क्या भारत से भी ये सब साफ़ करवा दिया?
आज भारत का बिग बिलियन डे और स्वच्छ भारत अभियान इन्ही विसंगतियों से भरा हुआ है. अमिताभ बच्चन कभी ये भी सोचें. कहीं आपके महा-पी. आर. के चक्कर में आम भुक्तभोगी जन भी अब क्या सिर्फ कैमरा के सामने ही सफाई करते हैं?
नोट - सन्दर्भ इकोनॉमिक्स का सिद्धांत है जिसे डिमांड और सप्लाई ग्राफ कहते हैं. डिमांड कृतिम रूप से बढ़ाने का एक तरीका मूल्य कम कर देना होता है, या/और मार्केटिंग उन्माद फैलाना होता है , जिससे अति उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिलता है. हमारा ये मानना है की हर वस्तु का मूल्य उसके कार्बन फुटप्रिंट( उत्पादन से डिस्पोजल तक) यानि उसका ग्रीन कास्ट, के अनुसार हो, समाज पर उसका असर क्या हो रहा है इसको भी ध्यान रखा जाए, जैसे गूगल और चाइना के ट्रैकर लगे सस्ते फ़ोन, जो कुछ महीनों में विषैला कचरा हो जाते हैं, की असल कीमत, ग्रीन और ह्यूमन कास्ट मिला कर क्या होगी? . इकोनॉमिक्स में भी सब्सिडी और डिस्काउंट इत्यादि को सही नहीं कहा गया है, मगर बड़ी कंपनियां मार्किट कब्जाने और लत लगाने के लिए ये कार्य आजकल खुल्ले आम कर रही हैं और बड़े बड़े लोग खुल कर इसमें शामिल होते दिखाई देते हैं.