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नदी संरक्षण की 5 अहम् सुझाव

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भारत क

भारत की कई पवित्र नदियों में गोमती का नाम भी शामिल है। पुराणों के अनुसार गोमती ब्रह्मर्षि वशिष्ट की पुत्री है तथा एकादशी को इस नदी में स्नान करने से संपूर्ण पाप धुल जाते हैं।

पापों को मुक्त करते करते गोमती खुद मुक्ति की राह में आ गयी है। 940 किमी का सफ़र तय करने वाली यह पवित्र नदी अपने अस्तित्व के हक़ के लिए जूझ रही है। जल जीवों का पालन पोषण करने वाली नदी उनकी मौत की जिम्मेदार बन गयी। बढ़ते विकास,बड़ी-बड़ी इमारतों, बढ़ते कारखानों की दौड़ में गोमती का अस्तित्व ख़त्म सा हो रहा है।

आईटीआरसी (ITRC)(इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टॉक्सिकोलॉजी ) शोधपत्र के अनुसार चीनी मीलों, शराब के कारखानों की वजह से गोमती का जल प्रदूषित हो गया है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है की अधिक मात्रा में उर्वरक के उपयोग से भी गोमती का जल प्रदूषित हो गया है। ऐसी परिस्थितियों से लड़ना बहुत जरुरी हो गया वरना एक दिन गोमती का अस्तित्व बस पुराणों और किताबों में ही रह जाएगा और जीवन देने वाली यह नदी उन्ही जीवों क लिए अभिशाप बन के रह जाएगी ।

गोमती को बचाने ने लिए BallotboxIndia  के researcher और आंबेडकर यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर  डॉ. वेंकटेश दत्ता ने अपनी रिसर्च में कुछ अहम् सुझाव दिए हैं।

1.गोमती को राज्य धरोहर घोषित किया जाए।

जीवनदायिनी गोमती आज महज कचरा ढ़ोने का नाला बन चुकी है। इतनी समस्याओं से जूझने के बाद भी गोमती को साफ़ और सुन्दर बनाने की उम्मीदें अभी जिन्दा है। गोमती नदी एक ऐसी नदी है है जो जमीन के अन्दर से निकलती है और जगह जगह से जल लेकर निरंतर बहा करती है और गंगा में आ कर मिलती है। डॉ. वेंकटेश दत्ता जी का कहना है की गोमती नदी को राज्य धरोहर घोषित कर देना चाहिए। ऐसा करना उत्तर प्रदेश लिए भी गर्व की बात होगी। उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय चिन्ह मछली अपनाये जाने की प्रेरणा गोमती से ही मिली है। गोमती को राज्य धरोहर घोषित करना गोमती के जीवन के हित में एक अहम कदम होगा।

2. गोमती के उद्गम व् गंगा में संगम स्थल को पर्यावरण की द्रष्टि से अतिसंवेदनशील छेत्र घोषित कर देना चाहिए।

नदी के उद्गम व गंगा से मिलन स्थल सहित इसमें मिलने वाली सहायक नदियों के संगम को इको फ्रेजाइल जोन (पारिस्थितिकीय संतुलन की दृष्टिकोण से अति संवेदनशील) करने की जरुरत है। गोमती नदी में खुद इतनी छमता है की वह अपनी जल को स्वयम शुद्ध कर सके मगर संरक्षण न होने की वजह से धीरे धीरे अपनी खूबियों को खोती जा रही है। लोगों की अधिक श्रद्धा भी गोमती के लिए चिंता का विषय बन गयी है। लोग अपने घरों क पुराने फूल-मालाओं, देवी देवताओं की मूर्तियाँ आदि चीजों को भी गोमती में विसर्जित कर देते हैं।

3. नदी का छेत्र घोषित कर भुलेखों में उसका स्पष्ट उल्लेख किया जाए।

जगह-जगह लोग नदी का अतिक्रमण करते हैं। हर व्यक्ति अपनी मनमानी करता है। गोमती के लिए कोई कानून नहीं है। जबकि गोमती से करोड़ों लोगों का जीवन चलता है। इसलिए गोमती के छेत्र का स्पस्ट उल्लेख होना चाहिए और उसके अतिक्रमण के लिए कानून बनाना भी जरुरी है।

4. नदी के 500 मीटर तक किसी तरह के पक्के निर्माण पर रोक लगे।

जन जीवन से जरुरी हो गई है सुन्दरता। गोमती में बढ़ते प्रदूषण को रोकने की जगह सरकार ने गोमती की सुन्दरता को महत्व दिया है। गोमती के तट का सुन्दरीकरण बहुत से सवाल खड़े करता है। क्या नदियों को उनके प्राकृतिक रूप से बदल के बनावटी ढांचा देना सही है? करोड़ों रुपये की धनराशि गोमती के प्रदूषण को छोड़ कर उसके सुन्दरीकरण पर व्यय करना गोमती के साथ बैमानी का सौदा है। ऐसा ही कुछ 2012 के चुनाव में पूर्ण बहुमत से आई समाजवादी की सरकार ने किया है। गोमती के सुन्दरीकरण के लिए गोमती रिवेर्फ्रोंत नमक करोड़ की राशी की योजना बनायीं गयी। सिंचाई विभाग के अंतर्गत यह योजना की शुरुआत की गयी जिसमें गोमती की बाढ़ को रोकने के लिए जमीन के अन्दर दोनों तरफ 16 मीटर की दीवार का निर्माण किया गया जो नदी के दोनों किनोरों को जोडती हैं जिनकी चौड़ाई 150 मीटर है। बहुत से विशेषज्ञों का भी मन्ना है ऐसा करना प्रकृति को चुनौती देना है।

5. तालाब, पोखरों और कुओं को पाटना बंद किया जाना चाहिए। 

बढ़ते विकास की दौड़ में एक हिस्सा छुटता जा रहा है। अगर बात करें तालाब कुओं और पोखरों की तो दिन पर दिन इनकी तादात कम होती दिखाई दे रही है। भारत में 9.8 प्रतिशत तालाब औरे झीलों से निकलती हैं। पहले गांव-कस्बे आदि से गंदे पानी के लिए एक निस्तारी तालाब हुआ करता था, जिससे निथर कर पानी दूसरे तालाब में पहुंचता था। दूसरे तालाब में कपड़े धोने आदि का काम किया जाता था। वहीं तीसरा तालाब ऐसी जगह बनता था जहां पर धरती में पानी रिसकर जा सकता था। इस तरह दो तालाबों से होता हुआ पानी तीसरे तालाब में और तीसरे तालाब से झरनों और छोटी नदियों का जन्म होता था। गोमती को बचने के लिए फिर दुबारा से तालाब, पोखरों और कुओं का पुनःनिर्माण की आवश्यकता है।

6. रासायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग कम किया जाए।

मानव का विकास जल जीवों के लिए बन रहा अभिशाप। बाजारों में तरह तरह प्रकार की रासायनिक खाद और मंहगे कीटनाशक आ रहे हैं। जिसका उपयोग किसान ज्यादा पैदावार के लिए करता है जो नदियों और जल जीवों के लिए काफी नुकसानदायक है। अधिक प्रयोग से नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं और जल जीवों की भी जिंदगी खतरे में होती नजर आ रही है ।

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