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  • Swarntabh Kumar
  • 716
  • Parliament House
  • March 24, 2017, 5:25 a.m.
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भारत की महंगे चुनाव प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत, ‘जनमेला’ बनेगा विकल्प – एक प्रस्ताव निर्वाचन आयोग को

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गरीबी रेखा के नीचे 27.5 प्रतिशत लोग पर चुनाव बेहद महंगा 

भारत की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है. 2004 के सरकारी आकड़ों के मुताबिक 27.5 प्रतिशत देश की आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहने को मजबूर हैं. विकास की ओर बढ़ते प्रगतिशील भारत में बहुद बड़ा तबका भूखे सोने को मजबूर है. कुपोषण के मामले में भारत का नाम बेहद नीचे है. अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट में 118 देशों की सूचि में भारत का स्थान 97 है जो अपने पड़ोसी देश नेपाल, बांग्लादेश यहाँ तक श्रीलंका और म्यांमार से भी कहीं नीचे है. देश में सभी को शिक्षा, रोटी, कपड़ा और मकान मिल पाए यह अभी भी एक स्वप्न जैसा प्रतीत होता है. ऐसे में देश में होने वाले खर्चीले चुनाव कहीं से भी जायज नहीं लगते. आम जनता के कर से होने वाले से इस चुनाव का बोझ भी आम जनता पर ही पड़ता है. साथ ही हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चुनाव आयोग के द्वारा चुनावों में होने वाले खर्च के अलावा उम्मीदवारों के भी अपने खर्चें होते हैं जो की बेहिसाब और बेहद ही खर्चीले होते हैं. हमें यहाँ यह भी समझने की जरुरत है कि राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले बड़े-बड़े चंदे उद्योगपतियों से प्राप्त होते हैं और जीत के बाद इसकी भरपाई भी राजनीतिक दलों को करना पड़ता है, साधारण शब्दों में कहा जाए तो उन्हें फायदा पहुंचाया जाता है. ऐसे में एक बहुत ही अहम सवाल खड़ा होता है कि क्यों ना इस महंगे चुनाव को सस्ता बनाने की प्रक्रिया चलाई जाए. चुनावी खर्चें का बोझ आम जन पर ना पड़े इसके लिए इस और भी ध्यान दिया जाए. वरना आम लोगों की तो यही सोच है कि राजनीति पैसे वालों का खेल है.

चुनाव में कालेधन का खेल 

कालेधन के मामले में सभी नेता के एक विचार है. सभी का मानना है कि इस पर रोक लगनी चाहिए, तो क्यों ना इसपर अंकुश लगाने के लिए चुनावी खर्चें में सेंध मारी की जाए. चुनाव बेहद महंगे होते हैं अगर वही किसी कारणवश दूबारा करवानी पड़े जैसे पूर्ण बहुमत ना मिल पाने की स्थिति में या एक ही उम्मीदवार के दो-दो जगह जीत जाने के कारण ऐसे में चुनाव और भी खर्चीला हो जाता है. चुनाव आयोग द्वारा चुनावी खर्चा अलग भी कर दिया जाए तो उम्मीदवारों द्वारा किया जाने वाला खर्चा बेहिसाब होता है. हकीकत में चुनाव में कितना पैसा खर्च होता है इसका हम सिर्फ अंदाजा भर ही लगा पाते हैं. असल में किया जाने वाला खर्च आम राय में बहुत ज्यादा होता है जिसकी सही जानकारी उसी उम्मीदवार को होती है जो चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान पानी की तरह पैसा बहाता है. रैलियां, रोड-शो, वाहनों का जखीरा, हेलीकाप्टर का इस्तेमाल, डीजल-पेट्रोल, कार्यकर्ताओं के खाने-पीने से लेकर पोस्टर-बैनर, होर्ड़िंग और अन्य दूसरे तरह के खर्चों का हम सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं. अपनी संपत्ति का ब्यौरा बता कर इस तरह का खर्चा कहीं से हजम होने लायक नहीं है और इसमें कालाधन का भी इस्तेमाल होता है इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

उम्मीदवारी के लिए करोड़ो की बोली

अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने है. ऐसे में इस बड़े राज्य में नेता टिकट पाने के लिए और उसे प्राप्त करने के बाद बचाने के लिए जमकर पैसा खर्चा करते हैं. ऐसा सिर्फ हमारा कहना नहीं है उत्तर प्रदेश की एक प्रमुख पार्टी के कई नेता और उम्मीदवार जिन्होंने पार्टी छोड़ दी उन्होंने यह गंभीर आरोप लगाया है. उनका कहना है कि टिकट देने के एवज में उनसे करोड़ो रुपय मांगे गए. यही नहीं एजेंडा आजतक में जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने दावा किया कि भारत के चुनाव में कालेधन का उपयोग कर चुनाव लड़ा जाता है और भविष्य में भी ऐसा ही जारी रहेगा. आज संसदीय चुनाव लड़ने के लिए कम से कम 10 करोड़ रुपए की जरूरत होती है. हेलीकाप्टरों, अभियान के दौरान वाहनों का इस्तेमाल, पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ दिन-रात लगने वाले लोगों के खर्चें एक बड़ी राशि होती है. यह धन कहां से आया? अगर हम फारूक अब्दुल्ला की बात माने तो इसका मतलब यह भी हुआ किया उन्होंने भी अपने चुनाव में कालाधन का इस्तेमाल किया होगा.

चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार के लिए तय कर रखी है सीमा

इन सबके बाद आपको यह भी जानने की जरुरत है कि चुनाव आयोग ने हर स्तर के चुनाव प्रचार के लिए एक सीमा तय कर रखी है. विधानसभा चुनाव में में एक उम्मीदवार छोटे राज्यों के लिए 20 लाख रुपए हैं तो वहीं बड़े राज्यों के लिए यह 28 लाख रुपए खर्च कर सकता है. वहीं लोकसभा चुनाव में इसकी अधिकतम सीमा 70 लाख रुपए तक है. छोटे राज्यों के लिए इसकी अधिकतम सीमा 54 लाख रुपए है. पहले पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों के लिए चुनाव खर्च 40 लाख रुपए तय किया गया था. मगर बाद में इसमें बढ़ोत्तरी की गई और ऐसा कुछ नेताओं के शिकायत पर हुआ जो इतनी बड़ी राशी को चुनाव खर्च के लिए पर्याप्त नहीं मानते थे. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि गोवा जैसे छोटे राज्यों के लिए चुनाव में किए जाने वाले खर्च की सीमा 22 लाख से बढ़ा कर 54 लाख रुपए कर दी गई. यहीं नहीं लोकसभा चुनाव के लिए चुनावी प्रचार पर अधिकतम 70 लाख रुपए खर्च करने का निर्देश कुछ क्षेत्रों के लिए  अव्यावहारिक माना गया. इसके लिए यह कहा गया कि एक संसदीय क्षेत्र में औसतन 15-16 लाख और कहीं-कहीं और भी ज्यादा मतदाता के कारण इतने कम खर्च में सबसे संपर्क साध पाना संभव नहीं है. यहीं नहीं तमिलनाडु की पूर्व और दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता ने तो अधिकतम खर्च की सीमा को बढ़ाने के लिए अदालत में जाने तक की धमकी दे डाली.
श्रोत - ImpIns1_06032014.pdf

रोज होते लाखों खर्च मगर दिखाया जाता बेहद कम 

इसके बाद भी इन दिलचस्प आकड़ों को देखिए और समझिए कि किस तरह इन नेताओं के आपसी बातों और तर्कों में विरोध है. 2009 में जब लोकसभा चुनाव हुए थे तब खर्च की सीमा 40 लाख रुपए ही निर्धारित थी उस समय 543 में से जीते 437 सांसदों ने चुनाव प्रचार में औसतन 14 लाख 62 हजार रुपए खर्च किए गए घोषित किया. वहीं 129 सांसदों ने भी यह माना की उन्होंने अधिकतम सीमा का आधे से भी कम खर्च किया. अब ऐसे में इस बात पर भी गौर किये जाने की जरुरत है कि अभी अगले वर्ष उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं. निर्वाचन आयोग ने अभी चुनाव की तारीख भी जारी नहीं की है मगर अभी से बड़े-बड़े रोड शो, बड़ी-बड़ी जनसभाएं, साथ ही उम्मीदवारों और संभावित उम्मीदवारों का दिनरात इलाके में घूमना, गली-मोहल्लों के आयोजनों में शामिल होना. ऐसे में उम्मीदवारों और नेताओं के साथ कई-कई वाहनों को काफिला चल रहा होता है साथ ही अभी से टीवी चैनलों और समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में विज्ञापन आना कुल मिलाकर इसपर ही हर दिन लाखों खर्च होता है. ऐसे में 2009 में जीते सांसदों की घोषणा हजम नहीं होती. 

चुनाव प्रक्रिया में बदलाव की शुरुआत उत्तर प्रदेश और पंजाब विधानसभा चुनाव से

अब चुनाव चाहे वह विधानसभा का हो या लोकसभा का चुनाव प्रचार की भव्यता और इतना आकर्षक रूप यह जिज्ञासा जगाता ही है कि आखिर इस तामझाम पर कितना पैसा खर्च होता होगा? और इसीलिए शायद हम यह मानते हैं कि राजनीति पैसे वालों के लिए है. तो क्या हमें एक बार यह कोशिश नहीं करनी चाहिए कि राजनीति को सरल बनाया जा सके. एक आम इंसान भी उतना ही राजनीति में दखल रख सके जितना की पैसे वाले. क्या एक आम इंसान राजनीति में आने के ख्वाब नहीं देख सकता? क्या वह राजनीति में आकर देश के लिए कुछ बेहतर करने का मंसूबा नहीं पाल सकता? अगर आपका जवाब हां हैं तो हम आप सबके सामने खर्चीली राजनीति को बदलने का एक प्रस्ताव रखना चाहते हैं. इसकी शुरुआत हम उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव से कर सकते हैं.  जिसे हम आम जन से लेकर राजनेताओं और निर्वाचन आयोग तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे.

मंहगे चुनाव देश के विकास में बाधक

बैलटबॉक्स इंडिया बड़ी गंभीरता से यह मानता है मंहगे चुनाव देश के विकास में कहीं ना कहीं बाधक बनते हैं. साथ ही पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा किये जाने वाले खर्चों में बहुत बड़ा हिस्सा कालेधन का होता है. यह आम राय है कि इन्हें मिलने वाले चंदे के एवज में दानकर्ताओं को जीत के बाद फायदा पहुंचाया जाता है. साथ ही चुनाव के दौरान होने वाले आए दिन की रैली और सभाओं से, बड़े-बड़े लाउडस्पीकर के शोर से आम लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. साथ ही आज किसी की रैली तो कल किसी दूसरे पार्टी की तो किसी और दिन किसी अन्य प्रत्याशी की रैली के आयोजन से लोगों की आम दिनचर्या तक बदल जाती है. यही नहीं रैलियों और रोड शो के बाद अमूमन कचरों का ढेर लग जाता है. बड़े  नेताओं के आगमन के कारण ट्रैफिक तक में बदलाव कर दिया जाता है, सड़कें जाम हो जाती हैं लोगों का चलना तक मुश्किल हो जाता है, और ऐसा माहौल चुनाव भर आपको बड़ी आसानी से देखने को मिल जायेगी. 

सोशल मीडिया के द्वारा भी बेहिसाब खर्चा

यहीं नहीं सोशल मीडिया जैसा तंत्र आज राजनीतिक पार्टियों का हथियार बन गया है. चुनाव के दौरान इस पर भी जम कर पैसा बहाया जाता है. आज लगभग सभी बड़ी पार्टियों के पास साइबर सेल हैं जहां काफी लोगों को काम पर लगाया जाता है. जो दिन-रात प्रचार के नये तरीके अपनाते रहते हैं. गलत सूचना फैला कर लोगों को भ्रमित करने का प्रयास किया जाता है. ट्विटर, फेसबुक पर ट्रेंड चलाया जाता है. यहां भी चुनाव प्रचार के लिए बेहिसाब पैसा लगाया जाता है. हम इस मुहीम के द्वारा चाहते हैं कि राजनीतिक रैलियों तथा चुनाव के समय अनियंत्रित एवं अनियमित डिजिटल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर, गूगल इत्यादि पर राजनितिक दलों के प्रचार पर पाबन्दी लगे और 'जनमेला' (या जनत्रंत मेला) संस्कृति की शुरुआत हो. 

‘जनमेला’ से बदल जाएगा महंगे चुनाव का चलन  

इसमें शायद ही दो राय हो कि ऐसी परिस्थिति बदलनी चाहिए. चुनावी खर्चों में एक हद तक लगाम लग जानी चाहिए. इन सबका एक समाधान हो सकता है बस जरुरत है सबको इस दिशा में आगे बढ़ने की. चुनावों के दौरान हम आए दिन होने वाले रैलियों और उसके शोर से बच सकते हैं अगर निर्वाचन आयोग हमारे प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करे तो. हमें इन रैलियों और सभाओं पर रोक लगा देनी चाहिए. तो वहीं दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग को बस यह कोशिश करनी होगी कि वह एक ऐसे दो-तीन दिनों के ‘जनमेला’ का आयोजन कर सकें जहां एक विधानसभा क्षेत्र के सभी प्रत्याशी आयें. यह आयोजन मतदातओं के संख्या के आधार पर दो-तीन जगहों पर भी करवाया जा सकता है. इसके लिए एक समय निर्धारित कर दिया जाए और एक उपयुक्त जगह या मैदान में चुनाव से पहले इस ‘जनमेला’ का आयोजन किया जाए. जहां सभी प्रत्याशी अपने-अपने स्टॉल और एक समान मंच स्थापित कर ज़िम्मेदारी और जवाबदेही के साथ अपनी बात और विजन मतदाताओं के सामने पूर्व निर्धारित मानकों पर आधार पर रखें. ये मानक चुनाव आयोग या संसदीय विमर्श से तय किये जा सकते हैं. कुछ उदाहरण - आपकी पर्यावरण के बारे में समझ, आपकी स्थानीय संस्कृति पर पकड़, शिक्षा, आर्थिक पालिसी रुझान, विशेषज्ञता, प्रशासनिक या समाजिक अनुभव इत्यादि. साथ ही अपने विधानसभा क्षेत्र के विकास के बारे में उनकी क्या राय है, क्षेत्र की समस्याओं से कैसे निपटेंगे, उनका एजेंडा क्या है, उनकी भावी योजना क्या है आदि पर वह अपनी पूरी राय और जवाब हर उम्मीदवार अपनी पार्टी और अपने मत के हिसाब से ऑडियो, विजुअल, लिखित रूप से तैयार करे जिसे आम जनता को दिया जाए. जिसे वह बड़े इत्मीनान से पढ़े, सुने या देखें क्योंकि अपने क्षेत्र के विकास के लिए बेहतर प्रत्याशी का चुनाव तो आखिरकार उन्हें ही करना है. यहां प्रत्येक मतदाताओं की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इस मेले के प्रति पूर्ण समर्थन जताए और अपनी भागीदारी से सही उम्मीदवार का चयन करें.

जनमेले से होगा प्रत्याशियों को परखने का मौका

जनमेले के दूसरे दिन सभी प्रत्याशियों को एक मंच दिया जाए और सभी को एक समान समय देकर अपनी बात रखने का मौका मिले. उसके बाद प्रत्याशियों के बीच शालीनता के साथ खुली बहस करवाई जाए. अपनी मर्यादा और गरिमा का उलंघन करने वालों के लिए जनता अपनी राय स्वतः ही बना लेगी. इसके बाद अगर समय बचे तो उसी दिन नहीं तो अगले दिन जनता जनार्दान को प्रत्याशियों से सवाल पूछने का मौका दिया जाए, इसमें हो सकता है कि कुछ लोग आरोप लगाए की वह किसी खास पार्टी का समर्थक है मगर उसे भी सवाल पूछने का उतना ही हक मिलना चाहिए साथ ही प्रत्याशी में अगर दम है तो वह अपने तर्कों के आधार पर उसके सवालों का जवाब दे.

हमें यहां यह भी समझना होगा कि इससे तो चुनाव करवाने वाली संस्था पर ही बोझ बढ़ेगा तो उसके लिए भी हमारा प्रस्ताव है कि चुनावी चंदा किसी पार्टी विशेष को ना दे कर इसे ‘जनमेला’ फंड्स में जमा करवाया जाए, जिससे इन्हें सुचारू ढंग से चलाया जा सके. 

जनमेले से हो सकता है कई समस्याओं का निदान

  • इस तरह जनसभाओं और रैलियों पर प्रतिबन्ध लगाने से ना ही इससे सिर्फ उम्मीदवारों द्वारा बेहिसाब पैसा खर्च करने पर रोक लगेगी बल्कि कालेधन को भी आसानी से खपाना मुश्किल होगा.

  • प्रधानमंत्री और ऐसे ही स्टार प्रचारक किसी भी कमज़ोर प्रत्याशी को उससे बेहतर प्रत्याशी पर भारी बना देते हैं , जनमेला इस प्रथा को समाप्त करेगा, प्रत्याशी अपने बल बूते , कौशल और मेरिट के आधार पर ही आगे बढ़ पाएगा।  प्रधानमंत्री इत्यादि को अपने मूल  कार्य पर ध्यान देने का मौका मिलेगा ना की चुनाव प्रचार करते रहने का।

  • साथ ही इससे आम लोगों को भी अपनी दावेदारी पेश करने का मौका मिल पायेगा. इससे साफ-सुथरी राजनीति को तो बढ़ावा मिलेगा ही साथ में हम जिसे लोकतंत्र कहते है उसके असल मतलब को भी बल मिल सकेगा.

  • उपर बताए गए समस्यां जैसे जाम, शोर, गन्दगी आदि जैसी समस्याओं से भी निदान मिल सकेगा. इससे आम जनता और प्रत्याशियों के बीच का अंतर कम होगा और जुड़ाव की भावना पैदा होगी.

  • चुनावों में उद्योगपतियों का दखल एक हद तक कम हो सकेगा. धीरे-धीरे इसमें कुछ और बदलाव करके भारत के चुनावी प्रक्रिया को हम और भी बेहतर बना सकते हैं.
  • न्यूनतम ख़र्चे के चुनाव से पैसा सही कार्यों, परियोजनाओं और कार्य के परिणामों पर केंद्रित हो जाएगा, जिनका हिसाब मानकों के आधार पर देना होगा ना की चुनाव में हज़ारों करोड़ खर्च कर सेल्फी खिंचवा वोट लेने में। 

मगर इसके लिए हम सबको और साथ ही निर्वाचन आयोग को इसपर गंभीरता से सोचने की जरुरत है. वैसे एक बेहतर बदलाव के लिए कई बाधाओं का सामना तो करना ही पड़ता है. निर्वाचन आयोग से हमारी प्रार्थना है कि वह हमारे सुझाव को गंभीरता से ले और आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनाव में इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर कुछ क्षेत्रों में शुरु करके देखें.

जनमेला की अवधारणा  - एक लाइव रिसर्च


भारत में चुनाव के समय पर होने वाली रैलियां और महा-रैला इत्यादि ना सिर्फ़ धन और समय की बर्बादी है, बल्कि कालेधन, भ्रष्टाचार, सामाजिक जीवन में नैतिक पतन और संसदीय प्रणाली पर बड़ा आघात हैं। 
इनका इस्तेमाल बिना किसी जिम्मेदारी के एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने के लिए ही होता है, 
चुनावों के समय कुछ बोहोत ही पैसे वाले या सत्ता में बैठे और सक्षम दल हर तरह के संवाद माध्यम चाहे वो रैलियां हों, नए सोशल और डिजिटल मीडिया मार्केटिंग माध्यम हों, या पुराने समाचार आधारित माध्यम हों, पर अपने अतुलनीय धन बल से हावी रहते हैं।
यह स्वस्थ लोकतंत्र पर एक बड़ा खतरा है।
हम इस मुहीम के द्वारा चाहते हैं कि राजनीतिक रैलियों तथा चुनाव के समय अनियंत्रित एवं अनियमित डिजिटल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर, गूगल इत्यादि पर राजनितिक दलों के प्रचार पर पाबन्दी लगे और ‘जनमेला’ (या जनत्रंत मेला) संस्कृति की शुरुआत हो।
यह ‘जनमेला’ उस विधानसभा क्षेत्र में एक उपयुक्त जगह या मैदान में चुनाव से पहले कुछ दिनों के लिए लगाया जाए। जहां सभी प्रत्याशी अपने-अपने स्टॉल और एक समान मंच स्थापित कर ज़िम्मेदारी और जवाबदेही के साथ अपनी बात और विजन और मतदाताओं के सामने पूर्व निर्धारित मानकों पर आधार कर के रखें ।
ये मानक चुनाव आयोग या संसदीय विमर्श से तय किये जा सकते हैं। कुछ उदाहरण - आपकी पर्यावरण के बारे में समझ, आपकी स्थानीय संस्कृति पर पकड़, शिक्षा, आर्थिक पालिसी रुझान, विशेषज्ञता, प्रशासनिक या समाजक अनुभव इत्यादि।
जिनके जवाब हर उम्मीदवार अपनी पार्टी और अपने मत के हिसाब से ऑडियो, विसुअल, लिखित रूप से तैयार करे।
यहां प्रत्येक मतदाताओं की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इस मेले के प्रति पूर्ण समर्थन जताए और अपनी भागीदारी से सही उम्मीदवार का चयन करें। 
हम ये भी चाहेंगे की चुनावी चंदा किसी पार्टी विशेष को ना दे कर इन्ही जन मेला फंड्स में जमा करवाया जाए , जिससे इन्हें सुचारू ढंग से चलाया जा सके.






देशवासियों से अपील 
निर्वाचन आयोग के साथ-साथ हमारी अपील हैं सभी देशवासियों से कि वह अपनी उर्जा और अपने मेहनत का जरा सा हिस्सा भारतीय चुनावी प्रक्रिया को बदलने वाले प्रस्ताव के समर्थन में दिखाएं, ‘जनमेला’ के समर्थन में आगे आयें, महंगे चुनाव के बोझ से देश को बाहर निकाले, एक कदम देश के लिए बढ़ाएं. देश के विकास में हम सबकी भी जिम्मेदारी उतनी ही है जितना भारतीय सरकार की. 

हमारा साथ दे.  आप किसी को जानते हैं,  जो इन मामलों के जानकार है, एक बदलाव लाने को इच्छुक हो, तो आप हमें coordinators@ballotboxindia.com पर लिख सकते हैं या इस पेज पर नीचे दिए "Contact a coordinator" पर क्लिक कर उनकी या अपनी जानकारी दे सकते हैं.

अगर आप अपने समुदाय की बेहतरी के लिए थोड़ा समय दे सकते हैं तो हमें बताये और समन्वयक के तौर हमसे जुड़ें.

यही नहीं अगर आप एक रिसर्चर हैं, या कर्मयोगी हैं और अपने कार्य को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक लाना चाहते हैं?  अगर समाज के लिए कुछ समय निकाल सकते हैं?  तो BallotBoxIndia के मंच से जुड़ें जरूर.  जुड़ने के लिए नीचे फॉलो बटन दबाएं.
 
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धन्यवाद
Ballot Box India Team.

ध्यान दें - ये एक ज़ारी रिसर्च है, इसके किसी भी पहलु पर टिपण्णी करने या सुझाव के लिए coordinators@ballotboxindia.com पर संपर्क करें 


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