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  • Arun Tiwari
  • 59
  • B.S.E. Board
  • May 23, 2017, 12:21 a.m.
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बिहार जल प्रबंधन समीक्षा और १० सुझाव

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  • बिहार जल प्रबंधन समीक्षा और  १० सुझाव
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हमने कभी सिंचाई के नाम पर नदियों को बांधा और कभी बाढ मुक्ति़-बिजली उत्पादन के नाम पर। नदी के नफ़ा-नुकसान की समीक्षा किए बगैर यह क्रम आज भी जारी है। एक चित्र में नदियों को जहां चाहे तोड़ने-मोड़ने-जोड़ने की तैयारी है, तो दूसरे में भारत की हर प्रमुख नदी के बीच जलपरिवहन और नदी किनारे पर राजमार्ग के सपने को आकार देने की पुरजोर कोशिश आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।
 
नोएडा से गाजीपुर तक गंगा एक्सप्रेस-वे परियोजना को आगे बढ़ाने की मायावती सरकार की पैरोकारी को याद कीजिए। श्री नितिन गडकरी द्वारा परिवहन मंत्री बनते ही गंगा जलमार्ग के नाम पर इलाहाबाद से हल्दिया के बीच हर सौ किलोमीटर पर एक बैराज बनाने की घोषणा को याद कीजिए।
  
श्री गडकरी ने अब ब्रह्मपुत्र किनारे भी राजमार्ग की परियोजना को आगे बढ़ा दिया है। तीसरे चित्र में साबरमती रिवर फ्रंट डेवलपमेंट माॅडल से निकला जिन्न, राजधानियों में मौजूद नदी भूमि को अपने को  व्यावसायिक कैद में लेने को बेताब दिखाई दे रहा है। चैथे चित्र में नदी पुनर्जीवन के नाम पर पहले नदियों की खुदाई और फिर उनमें पानी रोकने के छोटे बंधे बनाने की गतिविधियां दिखाई दे रही हैं। पांचवें चित्र में बांध प्रबंधकों का वह रवैया है, जो अपने लिए तय पर्यावरण संरक्षक नियमों पर ठेंगे पर रखता है। राष्ट्रीय हरित पंचाट द्वारा टिहरी हाइड्रोपावर डेवलपमेंट पर ठोका गया 50 लाख का जुर्माना इसी ठेंगे को प्रमाणित करता है।

ठेंगे पर अनुभव की सीख

इन सभी चित्रों में न कमला-कोसी के अनुभव की सीख दिखाई दे रही है और न ही महाराष्ट्र के बांधों से निकले भ्रष्टाचार और साल-दर-साल विनाशक होता सूखे से उपजी समझ। कोई समझ नहीं बन रही कि राजमार्ग बनाने  हैं, तो नदी से दूर जाओ और यदि बाढ-सुखाड़ का दुष्प्रभाव रोकना है, तो अन्य ज्यादा टिकाऊ, ज्यादा उपयोगी, ज्यादा स्वावलंबी, ज्यादा सस्ते और कम विनाशक विकल्पों को अपनाओ। कोसी के अनुभव को सामने रखिए और आकलन कीजिए कि हो सकता है कि सामरिक दृष्टि से ब्रह्मपुत्र राजमार्ग परियोजना महत्वपूर्ण हो, लेकिन क्या इससे ब्रह्मपुत्र का भी कुछ भला होगा ? क्या इससे ब्रह्मपुत्र किनारे के 1600 किलोमीटर लंबे भूभाग के उपजाऊ क्षमता, जैव विविधता, बसावट, पानी की उपलब्धता और बाढ़ की अवधि आदि पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा ? 

विरोधाभासी राजनीति

राजनीतिक चित्र देखिए। महाराष्ट्र सरकार ने एक लातूर से सीखकर जल साक्षरता और जल संचयन के छोटे ढांचों की तरफ कदम बढ़ा दिया है। आमिर खान और नाना पाटेकर जैसे अभिनेता पानी संजोने के काम को अपना दायित्व मानकर ज़मीन पर उतारने में लग गये हैं। लेकिन सुश्री उमाजी अभी भी केन-बेतवा पर अटकी पड़ी हैं। वित्त वर्ष 2016-17 में 10 लाख तालाबों के निर्माण के उनके दावे पर अभी भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है। सुश्री उमाजी अभी भी अविरलता सुनिश्चित किए बगैर नदियों की निर्मलता का दिवास्वप्न देख रही हैं। विशेषज्ञों की विपरीत राय के बावजूद दिल्ली के जलमंत्री रहे श्री कपिल मिश्रा श्री श्री रविशंकर के कार्यक्रम को बार-बार यमुना तट पर किए जाने का सुझाव सुझाते ही रहे हैं। यह रवैया बावजूद इसके है कि गंगा-यमुना की अदालती पहचान भी अब एक इंसान के रूप में है।
 
दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे नीति नियंता याद ही नहीं करना चाहते कि कभी ऐसा ही कथन कोसी तटबंध और फरक्का बैराज के पक्ष में भी देखा गया था। वे समझना ही नहीं चाह रहे कि हिमालय से निकली गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र अािद धारायें महाराष्ट्र की नदियों जैसी नहीं है। दुष्परिणाम आज हमारे सामने है। जीवनदायिनी कोसी को हमने हर मानसून में राह भटक जाने वाले विनाशक प्रवाह के रूप में तब्दील कर दिया है।
 
आज कोसी सर्वाधिक तबाही लाने वाली भारतीय नदी है। दामोदर नदी पर बने तटबंध ने प. बंगाल के जिला बर्दवान के तालाबों व समृद्धि का नाश किया है। कभी ब्रह्मपुत्र ही कटान और नदीद्वीप निर्माण के लिए जाना जाता था, फरक्का बैराज बनाकर अब हमने मां गंगा को भी द्वीप निर्माण और कटान के लिए विवश कर दिया है। दुष्परिणाम मालदा, मुर्शिदाबाद से लेकर पटना, इलाहाबाद तक ने भुगतना शुरु कर दिया है।
 
सुखद है तो सिर्फ यह कि गंगा जलमार्ग परियोजना को लेकर बढ़ी बेचैनी फिलहाल भले ही थम गई हो, लेकिन फरक्का बैराज को लेकर समाज और राज दोनो ही आज बेचैन नजर आ रहे हैं। ऐसे संदेश हैं कि लंबे अरसे से फरक्का बैराज के दुष्परिणाम झेल रही जनता अब फरक्का बैराज से तकनीकी तौर पर निजात चाहती है; ताकि भारत-बांग्ला देश जलसंधि भी सुरक्षित रहे और बैराज से पलटकर जाने वाले पानी से तबाही से भी लोग बच जायें। वे फरक्का बैराज की समीक्षा की मांग कर रहे हैं।

फरक्का बैराज समीक्षा की मांग

खबर है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं इस बेचैनी की अगुवई कर रहे हैं। यह अच्छा लक्षण है; किंतु यदि कटान रोकने के नाम पर मालदा, मुर्शिदाबाद जैसे ज़िलों में तटबंध/राजमार्ग निर्माण की परियोजना लाई गई अथवा गंगा में सिल्ट कम करने के नाम पर गंगा की खुदाई की परियोजना अपनाई गई, तो यह एक अच्छी बेचैनी का बेहद बुरा परिणाम होगा। अतः इतनी याददाश्त हमेशा ज़रूरी है कि समस्या के कारण का निवारण ही उसका सर्वश्रेष्ठ समाधान होता है। तटबंध और खुदाई सिर्फ लक्षणों का तात्कालिक उपचार जैसे काम हैं; जो कि बीमारी को निपटाते नहीं, बल्कि आगे चलकर और बढ़ाते ही हैं। इस बात को बिहार के लोगों से अच्छा शायद ही कोई और समझ पाया हो। नीतीश कुमार जी अभी से समझ लें, तो ज्यादा अच्छा होगा। 

बिहार जलप्रबंधन की भी करें समीक्षा

इस बात को यहां कहना इसलिए भी ज्यादा जरूरी है चूंकि पानी को लेकर बिहार सरकार का रवैया भी कम विरोधाभासी नहीं है। नीतीश जी एक ओर फरक्का बैराज की समीक्षा की मांग को समर्थन दे रहे हैं; आहर-पाइन की परंपरागत सिंचाई प्रणाली के पुनरोद्धार को बढ़ावा देने की अच्छी बात कहते रहे हैं; तो दूसरी ओर उनकी गाड़ी नदी जोङ परियोजनाओं के राजमार्ग पर दौड़ती दिखाई दे रही है; जबकि वे जानते हैं कि एक समय में जिस तरह नहरों, तटबंधों ने जिस तरह आहार-पाइन आधार बिहार की शानदार सिंचाई शानदार प्रणाली के व्यापक तंत्र को ध्वस्त किया था; नदी जोड़ भी वही करेगा।
 
अतिरिक्त पानी को लेकर समझने की बात यह है कि उत्तर बिहार से होकर जितना पानी गुजरता है, उसमें मात्र 19 प्रतिशत ही स्थानीय बारिश का परिणाम होता है; शेष 81 प्रतिशत भारत के दूसरे राज्यों तथा नेपाल से आता है। गंगा में बहने वाले कुल पानी का मात्र तीन प्रतिशत ही बिहार में बरसी बारिश का होता है। इसका मतलब है कि बिहार की बाढ़ को नियंत्रित करने  का रास्ता या तो नेपाल को तबाह करके निकलेगा या फिर नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में जलसंचयन ढांचों के निर्माण, सघन वनों की समृद्धि और जलप्रवाह मार्ग को बाधामुक्ति से। 
ऐसे उपायों को प्राथमिकता पर न रखने का नतीजा है कि बिहार में नहरों और तटबंधों के टूटने की घटनायें आम हैं। तिरहुत, सारण, सोन, पूर्वी कोसी...।
बरसात में बाढ आयेगी ही और हर साल नहरें टूटेंगी ही।
 
नहरों का जितना जाल फैलेगा, समस्या उतनी विकराल होगी; सेम अर्थात जलजमाव उतना अधिक बढ़ेगा। सेम से जमीनें बंजर होंगी और उत्पादकता घटेगी। इसके अलावा नहरों में स्त्रोत से खेत तक पहुँचने में 50 से 70 फीसदी तक होने वाले रिसाव के आंकङे पानी की बर्बादी बढायेंगे। समस्या को बद से बदतर बनायेंगे।
 
गंगा घाटी की बलुआही मिट्टी इस काम को और आसान बनायेगी। नदी जोड़ परियोजना के कारण सिंचाई मंहगी होगी, सोे अलग। क्या फरक्का बैराज की समीक्षा मांग बढ़ाने से आगे बढ़ाने से पहले बिहार सरकार अपने जलप्रबंधन तंत्र और योजनाओं की समीक्षा करेगी ? क्या वह बतायेगी कि कोसी-कमला से हो रहे विनाश को लेकर उनकी राय क्या है ? परंपरागत और स्वावलंबी जल प्रणालियोें का जन आधारित विकेन्द्रित व्यापक संजाल पुनः कायम करने में बिहार राज्य को अभी कितना वक्त लगेगा ? बिहार की नदियों में गाद जमाव तथा कटान के अन्य कारणों को दूर करने के बारे में उनका क्या ख्याल है ? 

बिहार की गंगा की अविरलता में बाधक गाद - समस्या और समाधान

वास्तविक समाधान की वास्तविक चुनौतियां। जल संसाधन विभाग, बिहार सरकार द्वारा गंगा विमर्श हेतु 18-19 मई, 2017 को को इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर, लोदी इस्टेट, नई दिल्ली में सेमिनार में सामने आयी कुछ मुख्य बातें
 
1. भारत में यह पहली बार है कि स्वयं किसी राजकीय विभाग ने किसी बांध-बैराज की उपयोगिता पर उंगली उठाई है। इससे गंगा की अविरलता पर उन थक चुकी आवाज़ों को बल मिलेगा, जो उत्तराखण्ड में गंगा की अविरलता पर छाये संकट पर प्रयास कर चुप बैठ गई हैं। उम्मीद है कि गंगा के निचले प्रवाह को लेकर उठी यह बहस, गंगा मूल में अवरिलता की बाधाओं को भी चुनौती देने का माहौल निर्मित करने में उत्प्रेरक की भूमिका निभायेगी। यह संभावना का प्रथम द्वार है।
 
2. भारत में आज़ादी के बाद से बाढ़ को लेकर अब तक बहुत बड़ा बजट खर्च किया गया और बहुत सारे भौतिक ढांचे बनाये गये। किंतु गाद को कभी बाढ़ के समाधान से जोड़कर देखने की कोशिश नहीं की गई। फरक्का बैराज के डिजायन करने वालों ने भी गाद के महत्व की अनदेखी की। परिणाम यह है कि 1954 में बाढ़ नीति बनने के बाद से 2011 के बीच अकेले बिहार में बाढ़ संभावित क्षेत्र का रकबा ढाई गुना बढ़ गया है। यदि मैं गलत नहीं हूं, तो गत् एक वर्ष बिहार सरकार द्वारा उठाई जा रही आवाज़, शासन के स्तर पर गाद को समस्या को रूप में चिन्हित कर समाधान तलाशने यह पहली शासकीय और व्यापक पहल है। यह पहल, पूरे भारत में इस बहस की संभावना खोलती है कि नदी, बाढ़, डेªनेज सिस्टम और भूमि के उपजाऊपन के बारे में नियोजन करते वक्त गाद को याद रखना क्यों ज़रूरी है। 
 
3.  सेमिनार के जो निष्कर्ष निकलेंगे, वे स्वयं इसके आयोजक जल संसाधन विभाग, बिहार सरकार को विवश करेंगे कि वह बिहार के नदी प्रबंधन और जल प्रबंधन तंत्र, कार्ययोजनाओं और नीतियों की आत्म समीक्षा करे। यह तीसरी संभावना है।
 
4. यदि इस सेमिनार का असल मकसद, अविरलता में बाधाओं के कारण हम इंसान मात्र पर जो दुष्प्रभाव हो रहा है, उसे कम करने के कुछ नये रास्ते खोजना मात्र है अथवा आगे चलकर यह नदी के जरिए नेता, अफसर, कर्जदाताओं, बाज़ार का मुनाफा सुनिश्चित करने वाली परियोजनाओं हेतु जनसहमति हासिल करने का राजनीति कौशल साबित हुआ; सीधे कहूं तो यदि समाधान के रूप में नदी की कृत्रिम तौर पर उड़ाही यानी ड्रेजिंग करना अथवा कटान प्रभवित इलाकों को बचाने के लिए कोई तटबंध बनाना अथवा इसके बहाने से उत्तर प्रदेश में बलिया तक आने वाले एक्सप्रेस वे को गंगा के निचले तट की ओर से कोलकोता या हल्दिया तक पहुंचाने की राह आसान करना अथवा जलमार्ग परियोजना को बिना बाधा पूरा कराने का एजेण्डा है, तो संभावना के चैथे दरवाजो के खुलने की कोई संभावना शेष नहीं बचती; बल्कि इससे विनाश की एक ऐसा दरवाजा अवश्य खुल जायेगा; जिसके लिए आगे चलकर हम सभी प्रतिभागी दोषी माने जायेंगे। 
 
यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि भारतीय का दुर्भाग्य है कि तकनीकी और वैज्ञानिक विषय विशेषज्ञों को देश बनाने का अधिकार नहीं दिया गया। निर्णायक शक्तियां जनप्रतिनिधि सभाओं और पूर्णरूपेण प्रशासनिक पदों पर बैठे लोगों के हाथों में दी गई हैं।  पिछले कुछ दशकों का अनुभव है कि हमारे शासन-प्रशासन ने समस्याओं को अब परियोजना और बाज़ार ने प्रोडक्ट में बदलना सीख लिया है। इस नज़रिए से परियोजनाओं की कर्जदाता एजेंसियों और उनके पीछे छिपकर अपने एजेण्डे को आगे बढ़ाने वाली बाज़ारू ताक़तें समाधान के तौर उन कदमों को मंजूर करा लेती हैं, ताकि समस्या भी बनी रहे और समाधान के नाम पर कमाई भी चलती रही।
 
खासकर, पानी की समस्याओं के समाधान के रूप में जो समाधान भारत में आज़ादी के बाद से लगातार पेश किए गये है; उनका आकलन करके देख लीजिए तकनीक और बाज़ार ने यही किया है। सरकारों ने भी उन्हे ही आगे बढ़ाने की हामी भरी है। 
 
वास्तविक समाधान को हासिल करने के मार्ग में आज सबसे बड़ी चुनौती यही है। इस पर बिहार सरकार को तसवीर साफ करनी चाहिए। हां, यदि चर्चा का लक्ष्य वाकई गंगा की अविरलता सुनिश्चित करना है, तो इससे भारत में नदियों की जीवन वापसी की वह संभावना फलीभूत होगी, बाज़ारु शक्तियों और अर्थिक व कृत्रिम ढांचागत विकास की आंकाक्षा के दबाव में भारत की सभी सरकारें जिसकी लगातार उपेक्षा कर रही हैं। यह चौथी संभावना है।
 
5.  गंगा जी के मसले पर सामान्य चलन यह रहा है कि शासन-प्रशासन चर्चा और अपनी समितियों में शामिल चाहे जिसे कर ले, अंतिम राय उसी की मानती है, जो संबंधित राजकीय विभाग का प्रमुख अथवा मातहत है। भीमगौड़ा बांध के मसले पर हिंदू समाज की मांग के जवाब में ब्रितानी शासन द्वारा किए समझौते, शंकराचार्य श्री स्वरूपानंद जी की प्रेरणा पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किए जाना, प्रो जी डी अग्रवाल की मांग पर तत्कालीन पर्यावरण मंत्री के रूप में श्री जयराम रमेश द्वारा गंगा मूल में जलपरियोजनाओं को रद्द कराना तथा पर्यावरण की दृष्टि से क्षेत्र विशेष को संवेदनशील घोषित करना इसका अपवाद है।
 
यदि बिहार सरकार तय कर सकी कि राय किसी के द्वारा भी दी गई हो यदि वह नदी के अनुकूल होगी, हम उसे मानेंगे भी और लागू भी करेंगे; समाधान तय करते वक्त इंसान की तुलना में भी नदी को प्राथमिकता पर रखेंगे; तो एक पांचवी और बुनियादी लोकतन्त्र की ऐसी संभावना है, लोकतंत्र की परिभाषा के अनुकूल जनप्रतिनिधि सभाओं से जिसकी सबसे ज्यादा उम्मीद की जानी चाहिए। 
  
6. एक वक्त वर्ष 1977-79 में आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा जी वगैरह कई लोगों ने हिमालय की चिंता जयप्रकाश नारायण जी तक पहुंचाई थी। उन्होने सात लोगों की कमेटी बनाई थी। राजघाट, बनारस में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता विकास भाई को इसका संयोजक बनाया गया था। संयोग से विकास भाई और जे पी दोनो का निधन हो गया और गंगा की अविरलता को एक मौका मिलने से रह गया। अभी फरक्का बैराज, गाद और नितिन गडकरी जी की जलमार्ग परियोजना ने अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं श्री नीतीश कुमार जी को गंगा का जे पी बनने का मौका मुहैया करा दिया है। यह इस प्रयास से निकलती संभावनााओं का छठा द्वार है।
 
नैनीताल हाईकोर्ट क का अधिकार क्षेत्र उत्तराखण्ड है। गंगा-यमुना को जीवित मानव के दिए दर्जे, अधिकार और जवाबदेही का दायरा भी फिलहाल उत्तराखण्ड से आगे नहीं है। मुख्यमंत्री श्री नीतीश जी को चाहिए कि भारत की नदियों पर शासकीय आपातकाल के इस दौर में वह नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले को आगे बढ़ाते हुए बिहार राज्य की नदियों को एक जीवित इंसान का वैधानिक दर्जा एवम् अधिकार प्रदान कराने की पहल कर इस छठी संभावना पर अपनी स्वीकृति दे दें। इससे उत्तर प्रदेश की बाध्यता होगी कि वे भी अपने प्रदेश में वैसा करे।
 
बिहार नदी नीति के निर्माण, फरक्का बैराज के साथ-साथ बिहार की नदी जोड़ परियोजनाओं और जलमार्ग परियोजनाओं की समीक्षा होने तक स्थानीय नदी जोड़ तथा जलमार्ग परियोजनाओं के काम पर रोक का निर्णय करने से यह संभावना और प्रबल होगी।
 
देखना है कि हम सब मिलकर इन संभावनााओं को कितना सच में बदल पाते हैं। यह हम सभी के संकल्प और एकजुटता पर निर्भर करेगा। निस्संदेह, इसमें संयोजन शक्ति के रूप में बिहार के वर्तमान नेतृत्व व जलसंसाधन विभाग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। 

तकनीकी संदर्भ एवम् सुझाव 

1. अब तक किए गये अध्ययनों और स्वयं शासकीय-प्रशासकीय बयानों से यह तो स्पष्ट है कि फरक्का बैराज के डिजायन में खामी है। इसके कारण यह अपने निर्माण के मूल उद्देश्य की प्राप्ति हेतु कभी भी सफल नहीं माना गया। अब यह खुद द्वारा एकत्र की गाद में इतना डूब चुका है कि इसके दुष्प्रभाव इससे ऊपर और नीचे के इलाकों में स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। कहा जा रहा है कि फरक्का बैराज बनने से पहले कोलकोता पोर्ट पर 6.4 मिलियन क्युबिक मीटर की गाद थी; अब 21.18 मिलियन क्युबिक मीटर है। 1960 के दशक में दो बिलियन टन गाद प्रतिवर्ष बांग्ला देश जाती थी; अब एक बिलियन जाती है। फरक्का के कारण डेल्टा में गाद कम जा रही है। सुंदरबन के लोहाचारा द्वीप के डूबने का समाचार पुराना है। कई को डूबने की चेतावनी मिल चुकी है। 1970 से अब तक माल्दा में करीब 4000 हेक्टेयर भूमि डूब चुकी है। 
  
लिहाजा, फरक्का बैराज की भूमिका के बारे में तय करना ज़रूरी हो गया है कि इसे ढहा दिया जाये अथवा कोई मज़बूरी ऐसी भी है कि डिज़ायन में परिवर्तन करके काम चलाना पडे़गा। इंजीनियरिंग में हमेशा में विकल्प होते हैं। इंजीनियरिंग की राय यह है कि गंगा मध्य के पांच मीटर प्रवाह को निर्बाध छोड़कर शेष प्रवाह के आधार पर डिजायन बनाना चाहिए। पांच मीटर क्यों ? धर्मक्षेत्र की राय के मुताबिक, राजा भगीरथ गंगा के लिए रास्ते बनाते हुए जिस रथ पर चले थे, वह इतना ही चैड़ा था। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के अनुसार, गंगा मध्य के इस क्षेत्र को गंगा का गर्भक्षेत्र कहा गया है। व्यवहार की दृष्टि से गंगा गर्भक्षेत्र में किसी को कदम रखने की भी इज़ाजत नहीं है।
 
सोचना होगा कि क्या गंगा गर्भ क्षेत्र को छोड़कर फरक्का पुनः डिजायन संभव और व्यावहारिक है ? आकलन करने का विषय है।
मालदा टाउन, मुर्शिदाबाद समेत प. बंगाल में बढ़ते कटान के कारणों के रूप में फरक्का बैराज की फीडर कैनाल की भूमिका का भी आकलन हो। 
 
यह भी आकलन को कि जमी गाद से हुगली की सहायक नदियों की गहराई कितनी प्रभावित हुई है। चूंकि बाढ़ के समय पानी का पलटकर आना कोई नई बात नहीं है। परंपरागत तौर पर पलट पानी की दिशा में खास स्थान में तैयार आप्लावन नहरें इस पलट पानी को खेतों तक ले जाती थी। तब यह पलट पानी नुकसान की बजाय, नफा पहुंचाता था। आप्लावन नहरों की गहराई कम और चैड़ाई ज्यादा होती थी; लिहाजा, इनमें पानी की गति ऐसी होती थी कि आप्लावन नहरें रेत पीछे छोड़ देती थी और गाद को खेत तक पहंुचा देती थी। ये समानान्तर बनाई जाती थी। आप्लावन प्रणाली अब लगभग नष्ट हो चुकी है। समाधान के तौर पर इस प्रणाली के पुनर्जीवित करने की उपयोगिता ओर संभावना को आंका जाना चाहिए। 
 
2. जहां तक पटना तक गंगा की गाद में फरक्का बैराज का सवाल है; यह एक अलग जांच का प्रश्न है। कहा जा रहा है कि पटना से फरक्का तक के 460 किलोमीटर में चार दशक में गंगा की गहराई में औसतन 50 फीसदी की कमी आई है। संभव है कि इसका फरक्का बैराज से कोई रिश्ता हो। निस्संदेह, इसे जांचा जाना चाहिए। इस दृष्टि से आकलन होना चाहिए कि गंगा और इसकी सहायक धाराआंे की प्राकृतिक तौर पर जो उड़ाही अर्थात डेªजिंग होती रहती थी कि उसमें कितनी कमी आई है और इस कमी के लिए फरक्का बैराज जिम्मेदार कितना है ?
 
वह जिम्मेदार है भी या नहीं अथवा खुद बिहार राज्य के स्थानीय कारण इसके लिए जिम्मेदार हैं ? 
 
मेरा मत है कि गाद की समस्या के कारणों को चिन्हित करने की कोशिश में फरक्का तक सीमित रह जाना अवैज्ञानिक होगा। हमें अन्य कारणों की जांच भी करनी ही चाहिए। 
 
बिहार में गंगा समेत कई खास नदियों के मूल स्त्रोत हिमालय में है। हम यह भी जांचे कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हिमालय से बिहार आने वाली नदियों में गाद की मात्रा का औसत बढ़ा हो और उनके कारण बिहार की गंगा में गाद बढ़ गई हो और हम दोष सिर्फ फरक्का पर मढ़ रहे हों ? मेरा अनुरोध है कि जिस वर्ष से गंगा में गाद जमाव की मात्रा बढ़नी शुरु हुई हो। उस वर्ष को सामने रखें, उसके एक दशक पहले और अब के आंकडे़ सामने रखें और देखें कि प्रत्येक आने वाली नदी में से बाढ़ के दौरान कितनी मात्रा तथा प्रतिशत गाद नदी किनारे के मैदानों में फैल जाती थी; अब कितनी मात्रा तथा प्रतिशत फैलती है।
 
यदि निष्कर्ष यह आता है कि गाद के नदी किनारे मैदानों में फैलने की मात्रा व प्रतिशत में कमी आई है, तो इससे जांच का यह बिंदु सामने आयेगा कि आखिरकार गाद को नदी किनारे के मैदान में फैलने से रोका किसने है; इसमें तटबंधों की कितनी भूमिका है और आहर-पाइन जैसे परंपरागत ढांचों के ढह जाने की कितनी भूमिका है। यदि बाढ़ ठहराव की अवधि बढ़ी है अथवा बाढ़ ने परंपरागत मार्ग की बजाय नया रास्ता चुना है अथवा नदी अपने किसी पुराने चैनल की ओर बह निकली है; तो भी अवरोधों को लेकर दृष्टि स्पष्ट होगी और हम सही समाधान की ओर बढ़ सकंेगे। 
  
3. गौर करने की बात है कि गाद नदी मध्य तब रुकती है, जब प्रवाह की गति एक निश्चित जरूरत से कम होती है। कटान तब होता है, जब प्रवाह एक निश्चित गति से अधिक, उलट अथवा वक्र हो जाये। कटान में कटकर आई मिट्टी का भी तो नदी मध्य गाद की बढ़ोत्तरी मेें कुछ योगदान होता है। अतः नदी का वेग बढ़ाने वाले, उसे उलटने वाले तथा वक्र करने वाले कारणों को भी चिन्हित करना होगा। सोचना होगा कि सारी सभ्यतायें नदी के ऊंचे तट की ओर बसाई गईं। हम निचले तट के ओर भी निर्माण कर रहे हैं।
 
हमने निचले तट की ओर तटबंध बनाकर बाढ़ मुक्ति की उलट योजना बनाई। बाढ़ मुक्ति के नाम पर प्रस्तावित गंगा एक्सप्रेस वे योजना भी गंगा के निचले तट को लेकर नियोजित की गई थी। जब सिंचाई विभाग, लोक निर्माण विभाग, नगर विकास विभाग, नदी प्राधिकरण और औद्योगिक गलियारे मिलकर नदी को दोनो ओर से बांध देंगे, तो उसके प्रवाह का वेग बढ़ेगा कि नहीं ? वेग यदि सीमा से अधिक बढ़ेगा तो वह कटान करेगा ही। गंगा जैसी नदी किनारे लिफ्ट कैनाल बना दीजिए और कहिए कि नदी नहीं काटेगी; यह कैसे हो सकता है ? इसमें नदी का क्या दोष ? गाद से इसके रिश्ते की जांच होनी चाहिए कि नहीं ? 
   
4. भारतीय अंतरजलमार्ग प्राधिकरण के चेयरमैन अमिताभ वर्मा की बिहार के मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह को जनवरी में लिखी चिट्टी बताती है कि छह नदियों पर जलमार्ग पर बिहार सरकार ने सहमति दे दी है। यह छह नदियां हैं - गंगा, गंडक, कर्मनाशा, कोसी पुनपुन और सोन। 
जानकारी के मुताबिक, हल्दिया से इलाहाबाद तक के जलमार्ग को राष्ट्रीय जलमार्ग - एक का नाम दिया गया है। राष्ट्रीय जलमार्ग- एक के लिए 37 करोड,़ 50 लाख डाॅलर कर्ज मंजूर कर दिया गया है। इसमें 1500 से 2000 डीडब्लयूटी क्षमता वाले जहाज चलायेे जायेगे। इतने वजन क्षमता के जहाज चलने के लिए गंगा कितनी चैड़ाई में कितनी गहराई चाहिए ? संभवतः शुरु में पेश यह आंकड़ा 50 मीटर की चैड़ाई में गंगा को 15 मीटर गहरे करने का था। गंगा जलमार्ग को लेकर डेªजिंग यानी कृत्रिम तौर पर उड़ाही का काम शुरु हो ही गया है। जलमार्ग परियोजना के नियंता इसे जलमार्ग का विकास कह रहे है; तो लगे हाथ यह भी जांच लेना चाहिए कि जिन छह नदियों में बिहार सरकार ने सहमति दी है, उनमें जलमार्ग विकास से नदी मध्य गाद कम होगी अथवा बढ़ेगी। इससे गाद की समस्या हल हो जायेगी या तल में छेड़छाड़ होने से गाद, गुणवत्ता व अन्य संबंधित समस्यायें बढ़ जायेगी ? कुछ विचार किया गया है ? 
 
यह जानकारी और जांच खासकर इसलिए भी ज़रूरी है, चूंकि नचिकेत केलकल की रिपोर्ट बताती है कि कहलगांव के निकट बरारी घाट, भागलपुर में उड़ाही चलने के बाद से वहां नदी के मध्य में गहराई घटी है और किनारे पर बढ़ी है। दूसरी रिपोर्ट यह है कि फरक्का बैराज से जितनी गाद निकासी होती है उससे दोगुनी जमा हो जाती है। यदि ये निष्कर्ष ठीक हैं, तो फिर बिहार सरकार को जलमार्गों को लेकर जताई गई अपनी सहमति पर पुनर्विचार करना चाहिए। 
हम सभी को मिलकर सोचना चाहिए कि हल्दिया से इलाहाबाद तक आने वाले जलमार्ग के विकास की कीमत कितनी होगी और राजस्व कितना आयेगा।
 
हम सब जानते कि जमी जमाई भू-संरचना की कसावट को एक बार छेड़ दो, तो उसमें जल्दी कसाव नहीं हो पाता। वह जरा से झटके से ढह जाती है। इसके कारण कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि जलमार्गों की उड़ाही यानी ड्रेजिंग एक अंतहीन परियोजना हो जायेगी ? इस काम के लिए अभी ड्रेजिंग कारपोरेशन आॅफ इण्डिया है। इसका बाकायदा एक वार्षिक बजट है। 2009 में केन्द्र सरकार ने इसके बजट को एक बोझ मानते हुए खुद एक पत्र लिखा था। विशेषज्ञ आकलन करें कि आगे चलकर यह बोझ कितना बढ़ेगा।
  
5. केन्द्र सरकार ने अदालत में शपथपत्र दिया था कि हल्दिया-इलाहाबाद जलमार्ग के मध्य वे कोई बैराज नहीं बनायेंगे। केन्द्र सरकार अपनी शपथ पर टिकी रहेगी, इसकी गारंटी तो संभवतः हम सभी में शायद कोई नहीं दे सकता। किंतु यहां एक अन्य तथ्य को भी गंगा, गाद, अविरलता और प्रदूषण की दृष्टि से विचारा जाना चाहिए। जानकारी के मुताबिक हल्दिया-इलाहाबाद यानी राष्ट्रीय जलमार्ग - एक हेतु वाराणसी, साहिबगंज, हल्दिया में बहुआयामी टर्मिनल बनायेंगे। कालूघाट और गाजीपुर में एक-एक अंतर माॅडल टर्मिनल बनायेंगे। वाराणसी, पटना, भागलपुर, मुंगेर, कोलकोता और हल्टिया में एक-एक राॅल आॅफ राॅन आॅन टर्मिनल बनायेंगे। फरक्का में नवीन नेविगेशन लाॅक तथा साहिबगंज व वाराणसी में बहुआयामी टर्मिनल के लिए अनुबंध भी हो चुका है। 
 
जलपोतों की मरम्मत, रखरखाव आदि के लिए व्यवस्था होगी। इन सभी से गंगा की अविरलता व गुणवत्ता बाधित होगी या नहीं ? इस चुनौती का नदी मध्य गाद से कोई लेना-देना है या नहीं ? यदि है, तो बिहार सरकार यू टर्न लेगी अथवा नहीं ? यह अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती है।
  
6. बिहार सरकार ने नदी जोड़ परियोजना को लेकर भी सहमत है। लगे हाथ बिहार की नदियों के पानी गुणवत्ता, नदी मध्य गाद जमाव मात्र की दृष्टि से नदी जोड़ भी समीक्षा कर लें, तो बिहार में गाद समस्या की सारी तसवीर ही साफ हो जायेगी। क्या सरकार ऐसा करेगी ?
  
7. अब आइये चर्चा करें अविरलता की; चूंकि आयोजकों ने सेमिनार के शीर्षक तय करते वक्त जाने अथवा अनजाने में अविरलता को केन्द्र में रखा है और गाद को अविरलता के मात्र एक बाधक के तौर पर शामिल किया है। मैं याद दिलाना चाहूंगा कि समाधान सदैव समस्या के मूल कारण में निहित होता है। यदि मूल कारण ही गलत चिन्हित किया जाये, तो वास्तविक समाधान तक नहीं पहुंचा जा सकता। शीर्षक के अनुसार बिहार में गंगा की अविरलता में गाद बाधक है। माफ कीजिए गाद को गंगा की अविरलता में बाधक के रूप में पेश करना गलत है।
  
बिहार से अच्छा कौन जानता है कि गाद अपने आप में नदी का वरदान होती है। चूंकि, सीवेज पाइपों से आई मलीन मिट्टी में अन्य तत्व होते हैं; लिहाजा, वह गंगा की गाद में मिलकर सीमेंट जैसी सख्त हो जाती है और गाद को बाहर जाने से रोकती है। हालांकि इसका अंश कुल गाद में थोड़ा ही होता है, लेकिन जम जाने के गुण के कारण वह नुकसानदेह तो है ही। 
 
खैर, समझने की बात यह है कि जब यही गाद नदी किनारे के मैदानों में फैलने की बजाय, गंगा के मध्य में यानी मिड चैनल में ठहरने लगती है, तो यह समस्या बन जाती है; फिर भी इसे गंगा अविरलता में बाधक के रूप में चिन्हित नहीं किया जा सकता। क्यों ? क्योंकि किनारे की बजाय, गंगा के मिड चैनल में आकर जम जाने के लिए वह स्वयं दोषी नहीं है। इसके कारण और हैं। इस नाते गंगा मध्य गाद का बढ़ना कारण नहीं, बल्कि गंगा की अविरलता के बाधक कारनाामों का दुष्प्रभाव है। इसे इसी रूप मंे चिन्हित किया जाना चाहिए। यदि हमें गंगा की अविरलता की वास्तव में चिंता करनी है, तो उन सभी बाधक कारनामों को ठीक से चिन्हित करके ही निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। इसके बगैर निष्कर्ष के गलत होने की संभावना हमेशा रहेगी। 
 
अविरलता में बाधक कारनामों को चिन्हित करने के लिए सबसे पहले ज़रूरी है कि हम संपूर्ण अविरलता की बात करें। प्रो. जी. डी. अग्रवाल के अनुसार, अविरलता एक आयामी नहीं होती; अविरलता त्रिआयामी होती है : वर्टिकल, लाॅंगीट्यडनल और लेटरल। इन तीनो आयामों से प्रवाह की निरंतरता बनी रहनी चाहिए। टनल में डालने और बांध में बांधने से जैसे ही यह संपर्क टूटता है, नदी की अविरलता को बाधित मानना चाहिए। जब नदी की भूमि पर पक्के घाट अथवा अन्य पक्के निर्माण होते हैं, इनसे तो कुछ दूरी के लिए लेटरल निरन्तरता बाधित होती है। एक बातचीत में
 
प्रो अग्रवाल ने प्रश्न उठाया है कि अब क्या लेटरेल कन्टीन्युटी पूरी तरह संभव है ? 
जवाब में उन्होने खुद कहा है कि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी के अनुसार राजगीर में भगीरथ के रथ के पहिए के कारण चार-पांच मीटर की चैड़ाई में लीक बनी हुई है। अब यदि इतनी चैड़ाई छोड़कर बांध/ बैराज डिजायन हों, तो लेटरल कन्टीन्युटी संभव है। सो मैं समझता हूं कि निरंतरता का त्रिआयामी होना संभव है। मैं समझता हूं कि अविरलता के तीनों आयामों को जैसे ही सामने रखेंगे, मेरा विश्वास है कि बाधाओं को चिन्हीकरण करने वाले हमारे त्रिनेत्र अपने आप खुल जायेंगे और वास्तविक समाधान के संबंध में हमारी दृष्टि समग्र और ज्यादा व्यापक हो जायेगी। 
 
8. समाधान की दृष्टि से यहां यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि गंगा सिर्फ एक नदी नहीं है 250 से अधिक छोटी-बड़ी नदियां मिलकर इसका निर्माण करती हैं। उत्तर बिहार से होकर जितना बारिश गुजरता है उसमें से 19 प्रतिशत ही स्थानीय बारिश का परिणाम होता है। शेष 81 प्रतिशत भारत के दूसरे राज्यों और नेपाल से आता है। बिहार की गंगा में बहने वाले कुल पानी में भी स्थानीय बारिश का योगदान मात्र तीन प्रतिशत बताया गया है। 
केन्द्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा की गाद में ज्यादा मात्रा घाघरा, गंडक और कोसी जैसी उत्तर धाराओं से आती है। इस लिहाज से नदी का वेग नियंत्रित बिहार में वर्षा जल संचयन की भूमिका की एक सीमा दिखाई देती है। यह ज्यादा दिखाई देता है कि बिहार की नदियों में गाद नियंत्रण का मतलब है, इससे ऊपर के राज्यों तथा हिमालय में मिट्टी का अपरदन नियंत्रित करना।
 
इसमें वन विभाग की क्या भूमिका है; देखना पड़ेगा कि नहीं। भू-खनन विभाग की क्या भूमिका है; बात करनी पडे़गी कि नहीं ? 
  
हिमालय बच्चा पहाड़ है। अतः कच्चा पहाड़ है। वह जितना हिलेगा, उससे आने वाली नदियां उतनी मिट्टी लेकर आगे बिहार आयेंगी। बिहार की नदियों में आने वाली मिट्टी का हिमालय में आने वाले भूकम्पों के बीच घटते अंतराल से भी कोई संबंध है; यह भूलकर गाद समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए हिमालय में जहां चाहे सुरंग निर्माण, जहां चाहे सड़क निर्माण, जहां चाहे नई बसावट, जहां चाहे, जिस चाहे निर्माण सामग्री का इस्तेमाल.. इन सभी का हिमालयी भूकम्प से रिश्ता है। भूकम्प की आवक कम करने में इनसे संबंधित विभागों/ एजेंसियों की भी भूमिका है। जैसे ही मैं इन तमाम पहलुओं को सामने रखते हैं, मुझे एहसास होता है कि गंगा की अविरलता और गाद संबंधी संकट का समाधान अकेले जलसंसाधन विभाग से नहीं होगा। वास्तविक समाधान के लिए जलसंसाधन विभाग को कई अन्य विभागों, सरकारों और समुदायांे के साथ तालमेल बिठाना होगा। यह कर पाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। 
  
9. यदि सभी पक्षकारों को एकमत करना है, तो हमें सभी संबंधित पक्षकारों को यह एहसास दिलाना होगा कि नदी अविरलता में पैदा की जा रही बाधायें कितने तरह के नुकसान कर रही हैं। हमे याद दिलाना होगा कि नदी का एक काम मीठे पानी और गाद को लेकर समुद्र तक पहुंचाना भी है। ऐसा करके ही नदी समुद्र के ताप और खारेपन को नियंत्रित करती है। नदी का एक काम गाद को लेकर समुद्र किनारे उपजाऊ डेल्टा बनाना भी है, ताकि समुद्र किनारे रहकर भी लोग भूख से न मरें। नदी का काम अपने बाढ़ क्षेत्र के भूजल और मिट्टी का शोधन करना भी है।
  
इसी कारण हिमालय, गंगा और हिंद महासागर को पूरे दक्षिण एशियाई पारिस्थितिकी का निर्धारक कहा गया है। गंगा की अविरलता में बाधा पैदा करना हिमालय, गंगा और हिंद महासागर की इस भूमिका में बाधा उत्पन्न करना है; जिसका दुष्परिणाम हम सभी अनिश्चित होते मौसम, पानी संकट, बढ़ते ताप, भूमि की घटते उपजाऊपन और बढ़ते समुद्र और डूबते डेल्टा के रूप में देख रहे हैं। इस कारण हिमालय की स्थिरता और गंगा की अविरलता सुनिश्चित करने की चिंता करना गंगा की मुख्य धारा के पांचों राज्यों ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया के लोगों की चिंता का विषय होना चाहिए।
 
गंगा की गाद में विशिष्ट गुण वाला ऐसा बैक्टीरियोफाॅज पाया जाता है, जिसका जन्म सिर्फ हिमालय में होता है। बकौल प्रो. जी. डी. अग्रवाल यह एक ऐसा अनुपम और अजीब बैक्टीरियोफाॅज है, जो न तो सांस लेता है, न भोजन करता है और न रेपलिकेट करता है। यह अपने होस्ट मे घुसकर क्रिया है। यह होस्ट गंगा की सिल्ट है। इसे यदि टनल अथवा बैराज में बांध दिया जाये, तो क्या यह क्रिया करेगा ? यदि इसकी संख्या नहीं बढ़ेगी, तो क्या गंगा की अनोखी अमृत शक्ति बचेगी ? बहुत संभव है कि हिमालय से निकलकर समुद्र तक बैक्टीरियोफाॅज के पहुंचने के कारण ही उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और बंगाल के गंगा किनारे के भूजल की निर्मलता लंबे समय तक सुनिश्चित रही हो। 
 
जब तक भगीरथी पर टिहरी बांध, गंगा पर भीमगौड़ा, नरोरा जैसे ढांचे नहीं थे, तब तक यह बैक्टीरियोफाॅज हिमालय में पैदा होकर बिहार और बंगाल तक आते थे। बहुत संभव है कि इनके कारण उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और बंगाल के गंगा किनारे के भूजल की निर्मलता भी सुनिश्चित होती रही हो। नीरी की एक रिपोर्ट बताती है कि अब मात्र 10 प्रतिशत बैक्टीरियोफाॅज ही नीचे आते हैं। शेष 90 प्रतिशत टिहरी की झील में बंधकर रह जाते हैं। जाहिर है कि टिहरी बांध द्वारा पैदा की रुकावट के कारण अब यह बैक्टीरियोफाॅज और हिमालय से निकली विशिष्ट गुणों वाली सिल्ट अब बिहार तक नहीं पहुंचती। बिहार को इसका यह हक कैसे मिले ? गंगा व किनारे के भूजल की गुणवत्ता के लिहाज से इस प्रश्न के उत्तर में उत्तराखण्ड में गंगा की अविरलता में बाधाओं से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और बंगाल की गंगा के बाशिंदों का भी सरोकार होना चाहिए। नीचे के राज्यों को अपने इस हक के लिए आवाज़ उठानी चाहिए कि नहीं ? 
 
गंगा घाटी में आर्सेनिक मिलने के प्रश्न में पूछना चाहिए कि आर्सेनिक कहां से आया ? स्पष्ट है कि गंगा ही लाई होगी; डेल्टा से आया होगा या धरती के नीचे की परत से आया होगा। गंगा घाटी में भूजल स्तर घट रहा है। भूजल सिंचाई भी बढ़ रही है। भूमि की निचली परत से ऊपर आया पानी अपने साथ आर्सेनिक को ऊपर ला सकता है। स्वामी सानंद जी प्रो. जी. डी. अग्रवाल जी ने बताया कि यदि आर्सेनिक आक्सीकृत फाॅर्म में है, तो वह पानी में घुल जायेगा। यदि आॅक्सीकृत फाॅर्म में नहीं है, तो पानी में नहीं घुलेगा। मिट्टी में पड़ा रहेगा; नीचे काॅर्बन के संपर्क में; रिड्युशड फाॅर्म में। हमें जांचना चाहिए कि टिहरी और आगे की बांध-बैराजों में रुके बैआिर्सेनिक का उठी हुई गाद से क्या कोई संबंध है या पानी के गिरते जलस्तर से कोई संबंध है अथवा जूट व धान की बौनी की जगह अधिक ऊंचाई वाली किस्मों से कोई संबंध है अथवा ऊपर टिहरी में रुक गये बैक्टीरियोफाजेज और विशेष गुण वाली सिल्ट से कोई संबंध है ?
 
मेरा मानना है कि सभी संबंधित राज्यों के प्रतिनिधियों को एक साथ बैठाकर जब इतनी समग्र दृष्टि के साथ अविरलता में बाधा के दुष्परिणामों की चर्चा होगी, तो वे समझ पायेंगे कि अविरलता में बाधा रोकने के लिए साथ आना उनके लिए किस तरह लाभकारी और जरूरी है; तब वे साथ आयेंगे; तब गंगा ही नहीं, पूरे भारत की नदियों की अविरलता के प्रश्न में एक ज्वार की तरह उठने की ऐसी शक्ति आयेगी, जो अविरलता के समक्ष बड़ी बाधाओं को बहा ले जायेगी। 
   
10.  निष्कर्ष के रूप में अपनी बात इस अनुरोध के साथ सम्पन्न करता हूं कि फरक्का की समीक्षा हो। अविरलता के त्रिआयामी पहलुओं को सामने रखकर बाधायें चिन्हित की जायें। गंगा की अविरलता हासिल करने के लिए राज-समाज-संतों का एक व्यापक साझा तैयार किया जाये। गाद की समस्या के समाधान के तौर पर उन उपायों को प्राथमिकता पर रखा जाये, जो बाढ़ के पानी को नदी किनारे मैदानों में फैलने दें; कटान को कम दें; हिमालय में भूकम्प की आवृति कम कर दे। जब समाधानों की प्राथमिकता सूची बने, तो प्राथमिकता प्रकृति के अनुकूलता की दृष्टि तय हों न कि उन ठेकेदारों, अफसरों, नेताओं, कर्जदाता एजेंसियों, तकनीक तथा व्यावसायिक आर्थिक शक्तियों के मुनाफे की दृष्टि से, जो चाहते हैं कि समाधान भी होता रहे और समस्या भी बनी रहे। 
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