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Rajeev Upadhyay yayavar

Rajeev Upadhyay yayavar

Naya Gaon(Saharanpur-Nanauta-247453)

राजीव उपाध्याय यायावर सहारनपुर में एक ऐसा नाम जो एक साथ कई कार्यों में लगा हुआ है. जहां यह इतिहास की विशेष जानकारी रखते हैं तो वहीं दूसरी तरफ यह लेखक भी है, पत्रकार भी, फोटोग्राफर भी और साथ ही साथ समाजसेवी भी. सहारनपुर के गांव सौराना के निवासी राजीव

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Action research

Ward and district projects Rajeev Upadhyay yayavar contributes to.

Biography & background — self/editorially authored, may be outdated

राजीव उपाध्याय यायावर सहारनपुर में एक ऐसा नाम जो एक साथ कई कार्यों में लगा हुआ है.

 

जहां यह इतिहास की विशेष जानकारी रखते हैं तो वहीं दूसरी तरफ यह लेखक भी है, पत्रकार भी, फोटोग्राफर भी और साथ ही साथ समाजसेवी भी. सहारनपुर के गांव सौराना के निवासी राजीव फिलहाल शोभित यूनिवर्सिटी, गंगोह में बतौर सहारनपुर विरासत अनुसंधान केंद्र में कोऑर्डिनेटर की भूमिका निभा रहे हैं.

 

अपने पिता आचार्य स्व. अतर सिंह शास्त्री के नक्शे कदम पर चलते हुए राजीव उपाध्याय ने हिंदी से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और फिर हिंदी साहित्य में ही स्नातकोत्तर किया. अपनी मातृभाषा से इतना प्रेम कि जब भी कभी इन्हें वक्त मिलता है यह बच्चों को हिंदी की बारीकियों को समझाने और पढ़ाने लगते हैं.

 

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पत्रकारिता के क्षेत्र में इनका 10 वर्ष का लंबा अनुभव रहा है. दो वर्ष अमर उजाला समाचार पत्र में, तो वहीं एक वर्ष दैनिक जनवाणी समाचार पत्र और साथ ही साथ दो वर्ष हिंदुस्तान समाचार के साथ भी इन्होंने कार्य किया है. पत्रिकारिता करते-करते इन्हें अपने जनपद सहारनपुर के इतिहास संबंधी जानकारी जुटाकर यहां की गौरवशाली धरोहर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की ख्वाहिश जागी. मगर राजीव बताते हैं कि सहारनपुर जनपद के इतिहास को खंगालकर बाहर लाने और इस क्षेत्र में कुछ अलग करने का संकल्प तो बचपन से ही उनके पिता आचार्य अतर सिंह शास्त्री के द्वारा संस्कार में रोपित किया गया था. उनके पिता अक्सर उन्हें कहा करते थे कि हमारा इतिहास विदेशियों द्वारा लिखा गया है जिसके पूर्ण लेखन की आवश्यकता है. यहीं से सहारनपुर के इतिहास को समझने, उकेरने और सामने लाने में यह शख्स लग गया.

 

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लगभग 10 वर्ष पहले जारी किए हुए इस कार्य को आज भी वह निरंतर निष्काम भाव से किए जा रहे हैं. अपने जनपद के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक पक्ष को लेकर कार्य करना अब उनकी दिनचर्या में शामिल हो चुका है. वर्ष 2011 में सहारनपुर जनपद के ऐतिहासिक जलाशयों को लेकर उनकी लिखी पहली पुस्तक 'अपनी धरोहर' का प्रकाशन हुआ. अपनी धरोहर पुस्तक सहारनपुर के ऐतिहासिक जलाशयों पर आधारित शोध ग्रंथ है. इस पुस्तक में महाभारत कालीन जलाशयों से लेकर इब्राहिम लोदी की बावड़ी तक के इतिहास को सामने लाया गया है. हमारी लोककथाओं के माध्यम से अबतक अनछुए इतिहास को भी सामने लाने की कोशिश रही है. वाकई सहारनपुर की प्राचीन जल व्यवस्था और यहां के नागरिकों का उनके प्रति सम्मान पुस्तक का मूल विषय है. सहारनपुर के अनेक जलाशयों के निकट और उनसे जुड़ी अनेक रोचक कथाओं का विवरण पुस्तक में दिया गया है. सौराना का पांडव वाला तालाब, सोना अर्जुनपुर सरोवर, अध्याना का सती सरोवर, कोटा का लालाओं का तालाब, खुजनावर का धनराज सरोवर, तीतरो का कर्णताल, बरसी का पांडव कालीन तालाब, प्राचीन तपस्थली का सूर्यकुंड, जखवाला तालाब, गंगोह के कंकराली सरोवर सहित अनेक जलाशयों से अपनी धरोहर पुस्तक आप सबको परिचित करवाती है.

 

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अपनी धरोहर पुस्तक को मिली सफलता और जिस तरह से उनके कार्य को सराहा गया उससे उत्साहित राजीव उपाध्याय ने 'सहारनपुर दर्शन' नामक अपनी दूसरी पुस्तक निकाली. सहारनपुर दर्शन पुस्तक सहारनपुर के गौरवपूर्ण इतिहास, विशाल भौगोलिक परिपेक्ष्य और अनछुए पर्यटन के साक्षात्कार कराने वाला संक्षिप्त शोध ग्रंथ है. इस पुस्तक में जहां प्रसिद्ध हिंदू तीर्थ मां शाकुंभरी देवी दरबार का परिचय मिलता है तो वहीं विश्वविख्यात इस्लामिक शिक्षा के केंद्र दारुल उलूम के इतिहास और वर्तमान की जानकारी भी मिलती है. देवबंद के प्रसिद्ध बाला सुंदरी मंदिर के अलावा सहारनपुर की मस्जिदों, जैन मंदिरों और गुरुद्वारों के विवरण सहित लखनौती का किला और हुजरे, कंपनी गार्डन, ब्रिटिश समय का ऐतिहासिक कब्रगाह, शाहजहां का शिकारगाह, कोटा की हवेलियों, सिंधु कालीन हुलास, सरसावा के टीले इत्यादि के विषय में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विवरण इस पुस्तक के मूल केंद्र में है.

 

इसके साथ ही उन्होंने कई पुस्तकों का संपादन भी किया है और साथ ही साथ दैनिक जागरण समाचार पत्र में सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर आधारित 50 से अधिक पत्रों का प्रकाशन इनके द्वारा किया जा चुका है. इनके कार्यों के लिए इन्हें मोक्षयातन इंटरनेशनल योगाश्रम की ओर से सर्वोत्तम 2011 सम्मान श्रृंखला के अंतर्गत 'संजय दृष्टि' सम्मान से भी सम्मानित किया गया है.

  

संस्कृति मंत्रालय की विशेष परियोजना 'शहरों की दास्तां' के लिए चयनित देशभर के 20 शहरों में से सहारनपुर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विषय पर पुस्तक लेखन का दायित्व इन्हें दिया गया है. अपनी मिट्टी से इतना अभूतपूर्व प्रेम की शोभित विश्वविद्यालय, गंगोह से जुड़कर सहारनपुर के इतिहास को खंगालने का प्रयास निरंतर जारी है. सामाजिक प्रयासों में भी यह दिन रात लगे रहते हैं अभी हाल ही में मेरठ डिवीजन के कमिश्नर डॉ. प्रभात कुमार द्वारा निर्मल हिंडन के लिए बनाई गई समिति में इनका भी एक नाम है. सहारनपुर की दूषित नदियों को संवारने के इस दायित्व को निभाने के लिए तैयार यह शख्स वाकई समाज के लिए बिल्कुल समर्पित है.

 

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