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जनवरी में कैसे पाएं स्वस्थ तन मन

ByDeepika Chaudhary Deepika Chaudhary   Contributors Kavita Chaudhary Kavita Chaudhary {{descmodel.currdesc.readstats }}

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भारतीय संस्क

भारतीय संस्कृति में हर मौसम एक उत्सव की भांति होता है, विशेषकर सर्दियां. कोपेन के जलवायु वर्गीकरण ने हालांकि भारतीय जलवायु का विविध रूप से स्पष्टीकरण किया है..परन्तु देखा जाये तो मानसूनी और उष्णकटिबंधीय जलवायु से परिपूर्ण हमारे देश में शीतऋतु की छोटी सी अवधि भी काफी समता लिए हुए है.

वस्तुतः नवम्बर से लेकर फरवरी माह तक भारत के विभिन्न हिस्सों में कहीं कम व कहीं अधिक ठंड पड़ती है. दिसम्बर से जनवरी के मध्य उत्तर भारत में सर्वाधिक महसूस की जाने वाली ठंडक, मध्य भारत में कुछ कम और दक्षिण भारत में अनुकूल मौसम लिए हुए होती है. समग्र देश में यह नई फसल का समय होता है और साथ ही समय होता है फसलों और संस्कृति से जुड़े विभिन्न उत्सवों का भी.

उत्तर भारत के बहुल स्थानों पर छाया कोहरा, जगह जगह जलते अलाव, धूप का सहारा ढूंढते लोग, हरि सब्जियों की बहार, तिल-गुड-मूंगफली का जगह जगह दिखना और भारतीय गृहणियों का मेवों के लड्डू बनाना आरम्भ कर देना परंपरागत रूप से सर्दियां आने का आभास करा देता है. तो वहीँ दूसरी ओर कोहरे के कारण विमानों, ट्रेनों का समय प्रभावित होना अथवा हाईवे पर हुए हादसों की कतार सरकारी तौर पर भी भीषण सर्दी की पुष्टि कर ही देती है.             

भारतीय ऋतु वर्णन के अनुसार शीत ऋतु को दो भागों में विभाजित किया गया है - हेमंत तथा शिशिर.

हेमंत ऋतु (मध्य नवम्बर - मध्य दिसम्बर) में ठंड कम व शिशिर (मध्य दिसम्बर - मध्य फरवरी) में अत्यधिक मात्रा में ठंड होती है. पृथ्वी पर पूरे वर्ष सूर्य की किरणें समान रूप से नही पड़ती परिणामस्वरूप पृथ्वी के सूर्य से दूर रहने के कारण शीत ऋतु प्रारंभ हो जाती है.

यूँ तो भारत में सर्दी की शुरुआत नवम्बर से ही हो जाती है, परन्तु ठंड का अत्यधिक प्रकोप दिसम्बर व जनवरी में ही देखने को मिलता है. शीत ऋतु में रातें बेहद लम्बी होती हैं और दिन बेहद छोटे होने लगते है. शीत ऋतु में सूर्य की स्थिति पृथ्वी से दूर होती है, जिस कारण पृथ्वी पर सूर्य की किरणें पूर्ण रूप से नही पहुँच पाती और ठंड बढ़ने लगती है.

जनवरी माह के अंतर्गत उत्तर भारत में ठंड अपने चरम पर होती है. यदि धार्मिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो आधी जनवरी के पश्चात मकर सक्रांति के बाद से सूर्य उत्तरायण होने लगता है, यानि ठंड का चक्र धीरे धीरे कम होने की ओर अग्रसर हो जाता है. मकर सक्रांति का उत्सव सम्पूर्ण भारत में विभिन्न नामों पोंगल (तमिलनाडु), उत्तरायण (गुजरात), लोहड़ी (पंजाब, हरियाणा और दिल्ली), बिहू (असम), सक्रांति (आन्ध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटका) के साथ मनाया जाता है. 

जनवरी में फसल चक्र -

इस ऋतु के प्रारंभ काल चक्र में कम तापमान होने के कारण गेहूं की फसल की पैदावार अच्छी होती है, इसी कारण यह मौसम गेहूं जैसी फसलों के लिए अत्यंत उपयोगी है. जनवरी में उगने वाले अनाजों में गेहूं, जौ प्रमुख हैं तथा मुख्य तिलहनों में सरसों, राई आदि सम्मिलित हैं.

हरी सब्जियों से यह ऋतु सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है, जैसे पालक, मेथी, धनिया, गोभी, मूली, गाजर, मटर इत्यादि सब्जियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती हैं. इन सभी सब्जियों का सेवन स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है.

आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार मौसम के अनुसार सब्जियों का सेवन करने से मनुष्य के भीतर पूरे साल भर विभिन्न रोगों से लड़ने की क्षमता उत्पन्न होती है तथा हरी सब्जियों में छुपे गुणों के खजाने से शरीर को उचित मात्रा में केलौरी, वसा, खनिज व रेशे प्राप्त होते हैं. जो स्वास्थ्य की दृष्टी से बेहद उपयोगी है. इनके सेवन से कैल्शियम, लौह, फास्फोरस, विटामिन्स, सोडियम आदि प्रचुर मात्रा में शरीर को प्राप्त होता है जो शरीर के लिए बेहद उपयोगी है.

आयुर्वेद के अनुसार शीत ऋतु में शारीरिक संरचना -

आयुर्वेदिक उपचार शक्ति का लोहा सम्पूर्ण विश्व में माना जाता है, इसे जीवन के विज्ञान के रूप में देखा जाता है. आयुर्वेद का उद्देश्य मनुष्य के दिमाग, शरीर और आत्मा के समग्र विकास की अवधारणा को साथ लेकर चलना है. आयुर्वेद के अंतर्गत तीन दोष, वात, पित्त और कफ, हमारे मन-शरीर प्रणाली को बड़े स्तर पर नियंत्रित करते हैं. जब ये तीन दोष अपने आदर्श संतुलन में होते हैं, तो हम बेहतर महसूस करते हैं, उत्तम स्वास्थ्य का आनंद लेते हैं और प्राकृतिक सौंदर्य को प्राप्त करते हैं.

कई कारक दोषों के संतुलन को प्रभावित करते हैं, उदाहरण के लिए, हमारी दिनचर्या, आहार और मौसम. सकारात्मक सोच, नियमित व्यायाम और मेडिटेशन आपके शरीर को शांत और संतुलित रख सकती है. यदि इन तीन आयुर्वेदिक शारीरिक प्रवृतियों के आधार पर आहार-विहार और दिनचर्या रखी जाये तो बेहतर स्वास्थ्य पाया जा सकता है. 

यदि शीत ऋतु में शारीरिक प्रवृतियों की बात की जाये तो शीतकाल में जठराग्नि बहुत प्रबल रहती है. जिस कारण शरीर को पाचक क्षमता के अनुसार आहार ग्रहण करना चाहिए. क्षेम कौतूहल शास्त्र के अनुसार भी कहा गया है –

आहारान् पचतिशिखि दोषानाहारवर्जितः।

दोषक्षये पचेद्धातून प्राणान्धातुक्षये तथा।।

इससे तात्पर्य यह है कि पाचक अग्नि आहार को पचाने का कार्य करती है, जिसमें यदि उचित संतुलित मात्रा में आहार का समावेश नहीं हो तो शारीरिक दोषों (वात, पित्त, कफ) के नष्ट होने से शरीर की धातुएं भी नष्ट हो जाती है, जिससे प्राणों का नाश संभव है.

वात संरचना :

प्रमुख रूप से वात प्रवृति के लोग सर्दी के आरंभ में अत्याधिक ठंड एवं जोड़ों में दर्द महसूस करते हैं. इस प्रवृति के लोग तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं. अत्याधिक सर्दी में इस प्रवृति के लोग उन्माद, भय और चिंता से भर जाते हैं तथा जनवरी की ठंड में इन लोगों को आराम की अधिक आवश्यकता होती है.

शरद ऋतु की तुलना में वात संरचना वाले लोगों का पाचनतंत्र अच्छा होता है, जिन्हें संपूर्ण दिन में छोटे छोटे भोजन करने चाहिए. सर्दियों के अंत में, जब बारिश होती है और बहुत ठंड होती है, तो वात प्रवृति के लोगों को सभी खाद्य पदार्थों को अच्छे से चबाकर खाना चाहिए क्योंकि उनकी पाचन अग्नि अधिकतम होती है.

वात संरचना के लोगों को शीत ऋतु में अक्सर सूखी या खुरदरी त्वचा, अनिद्रा, कब्ज, थकान, सिर दर्द, चिंता और बेचैनी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. सही आहार-विहार एवं दिनचर्या से इन समस्याओं का निवारण संभव है.

पित्त संरचना :

शीत ऋतु में पित्त प्रवृति वाले लोग आमतौर पर ठंडे मौसम का आनंद उठाते हैं,  इनके शरीर को लचीला रहने और जनवरी में थकावट से बचने के लिए भारी खाद्य पदार्थों की आवश्यकता होती है. वस्तुतः पित्त प्रवृति के लोग पाचन तंत्र में प्रज्वलन की समस्या से त्रस्त रहते हैं, जिसके चलते उन्हें पेट के रोगों से जूझना पड़ता है. हालाँकि शीत ऋतु में ठंड के चलते पित्त विकार काफी संतुलित हो जाते हैं, फिर भी इस तासीर के लोगों को गरिष्ठ भोजन एवं ओवर ईटिंग से बचना चाहिए. 

कफ संरचना –

कफ प्रवृति वाले लोगों के लिए शीत ऋतु दुष्कर होती है, अत्याधिक ठंड नहीं झेल पाने की विशिष्ट शारीरिक संरचना के कारण ये शीत-निष्क्रियता में चले जाते हैं. कोहरे के कारण भी ये लोग शारीरिक रूप से मंद पड़ जाते हैं, साथ ही उनके लिए सर्द मौसम स्थायी एवं गंभीर होता है.

इस प्रवृति के लोगों में साइनस और श्वसनतंत्र से जुड़ी समस्याएं सर्दियों में अत्याधिक बढ़ जाती हैं, इसके अतिरिक्त धीमे मेटाबोलिज्म सिस्टम के कारण भी रोग बढ़ने की आशंका रहती है. इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य की देख-रेख नहीं कर पाने के चलते इन्हें तैलीय त्वचा, धीमा पाचन, साइनस संकुलन, दमा, मोटापा, उदासीनता, डिप्रेशन, ध्यान एकाग्रचित करने में कठिनाई आदि दिक्कतों से भी दो-चार होना पड़ सकता है.

जनवरी में कैसी हो दिनचर्या –

अच्छी नींद की अहम भूमिका :

किसी भी व्यक्ति के लिए स्वस्थ दिनचर्या का पालन करना बेहतर स्वास्थ्य की सबसे बड़ी कुंजी है. इसके अंतर्गत अच्छी नींद की भूमिका सर्वाधिक है, एक स्वस्थ वयस्क के लिए आमतौर पर आठ घंटे की नींद उपयुक्त बताई गयी है. परन्तु शीतऋतु में सामान्यत: रातें लम्बी और ठंडी होती हैं, जिसके चलते अधिक नींद ली जा सकती है. रात को 10 बजे तक सोना और सुबह सूर्योदय के साथ या इसके थोड़े समय बाद जगना उचित रहता है.

नियमित रूप से करें व्यायाम :

सर्द मौसम में आलस्य का प्रभाव शरीर पर अधिकतम रहता है, जिसके चलते एक प्रकार की शारीरिक निष्क्रियता आ जाने से हृदय एवं फेफड़ों से जुड़े रोगों का खतरा बढ़ जाता है. अधिक आलस्य के कारण हम शरीर के प्रति लापरवाह हो जाते हैं और शारीरिक गतिविधियों के कम होने से हृदयाघात, कार्डियक अरेस्ट और मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियों की संभावना अधिक हो जाती है. इससे बचाव के लिए नियमित रूप से 15-20 मिनट तक व्यायाम करना आवश्यक है, जिससे रक्त संचारण एवं रक्त चाप सामान्य रह सके. इनमें तेजी से चलना, साइकिल चलाना, यौगिक आसन आदि को दिनचर्या में शामिल किया जा सकता है.  

प्राणायाम से दें तन मन को आरोग्य : 

इसके साथ ही शीत ऋतु में प्राणायाम करना अत्यंत आवश्यक है, जिससे शरीर के सभी अंगों में ऑक्सीजन की आपूर्ति सुचारू रूप से होती रहे. शुद्ध वायु के संचार से विशेषत: मस्तिष्क शांत एवं एकाग्र रहता है तथा सर्दियों में पनपने वाले अवसाद, चिंता इत्यादि से निजात मिलती है. श्वसन विज्ञान पर आधारित प्राणायाम को नियमित 15-20 मिनट अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करने से जनवरी जैसे ठंडे माह में भी आरोग्य प्राप्त किया जा सकता है. अग्निसार क्रिया, नाड़ीशोधन (अनुलोम-विलोम), कपालभाति प्राणायाम से शरीर को सर्दियों में गर्माहट, स्फूर्ति और तनाव से मुक्ति मिलती है.

सूर्य किरणों से प्रकाशवान हो तन मन : 

इसके साथ ही सूर्य की किरणों से शरीर को पोषित करना अत्याधिक महत्वपूर्ण है, सूर्य की किरणों से मनुष्य को विटामिन डी तो प्राप्त होती ही है, अपितु इससे निकलने वाली अल्ट्रा वायलेट किरणों से इम्यून सिस्टम हाइपरएक्टिव होने से रुकता है और प्रतिरोधक क्षमता भी बढती है. साथ ही सूर्य की किरणों से शरीर में मेलाटोनिन नामक हर्मोन का निर्माण होता है, जो अनिद्रा रोग को दूर करने में बेहद उपयोगी है. यदि सर्दियों में सरसों या तिल के तेल की मालिश शरीर पर करने के पश्चात सूर्यस्नान किया जाये तो यह प्रक्रिया शरीर को निरोगी बनाने में अत्याधिक प्रभावी सिद्ध होती है.   

जनवरी माह में आहारचर्या –

व्यक्ति का खान पान ही उसकी जीवनशैली को निर्धारित करता है. कहा भी गया है कि “जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन”, यानि खान पान यदि सही और मौसम के अनुरूप हो तो व्यक्ति का तन-मन दुरुस्त बना रहता है. सर्दियों के मौसम को वैसे भी सेहत बनाने का मौसम माना जाता है, क्योंकि इस समय हमारी पाचन-शक्ति बढ़ी हुई होती है और कुछ खास प्रकार के आहार को दैनिकचर्या में शामिल करके अच्छा स्वास्थ्य पाया जा सकता है. बेहतर स्वास्थ्य को गति देने वाली जनवरी माह की आहारचर्या निम्न प्रकार से है –

1. मौसमी फल एवं सब्जियां :

सर्दियों के मौसम में हरि पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, सरसों, मेथी, बथुआ, हरा धनिया आदि न केवल शरीर को विटामिन ए, विटामिन सी, कैल्शियम, आयरन आदि प्राप्त होता है, बल्कि इनमें एंटीऑक्सीडेंट भी पर्याप्त मात्रा में होता है, जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है.

गाजर, शलजम, मूली, अदरक जैसे कंदमूल शरीर को गर्माहट प्रदान करते है, इन्हें जूस अथवा सलाद के तौर पर रोजाना अपनी डाइट में शामिल करने पर बीटा केरोटिन और मैग्नीशियम जैसे तत्त्व भी शरीर को प्राप्त होते हैं.

फलों में मौसमी, आंवला, एवोकैडो, संतरा, अमरुद आदि फल तरह तरह की विटामिंस एवं प्रोटीन के साथ साथ एंटीऑक्सीडेंट युक्त भी होते हैं. विशेष रूप से आंवला बेहद औषधीय गुणों से युक्त है, इसमें पाए जाने वाले पोषक तत्त्व जैसे विटामिन ए-सी-ई-बी काम्प्लेक्स, कैल्शियम, आयरन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, प्रोटीन, जिंक, केरोटिन इत्यादि से सर्दियों में शरीर को पूरे वर्ष के लिए प्रतिरोधक क्षमता मिलती है. साथ ही टमाटर का उपयोग सलाद एवं सूप के रूप में करने से लाइकोपीन एवं पोटैशियम पर्याप्त मात्रा में शरीर को प्राप्त होता है, जिससे सर्दियों में अधिक बढ़ने वाला कोलेस्ट्रॉल कम होता हैं.

2. मिश्रित खाद्यान्नों का प्रयोग –

जनवरी में गेहूं और चावल के अतिरिक्त मक्का, बाजरा, रागी जैसे अनाजों का प्रयोग करने से शरीर पुष्ट होता है. सर्दियों का मौसम इन सभी गर्म अनाजों को ग्रहण करने के लिए सर्वोत्तम है. बाजरे में प्रोटीन व् आयरन प्रचुर मात्रा में होता है तथा इसमे कैंसर कारक टाक्सिन नही बनते है. बाजरे की गरम प्रकृति के कारण इसे खाने वालों को अर्थ्राइटिस, गठिया व दमा आदि नहीं होता. मक्का एक बेहतरीन कोलेस्ट्रोल फाइटर खाद्यान्न माना गया है, जो अपने खास एंटी-ऑक्सीडेंटस के कारण दिल के मरीजों के लिए सर्दियों में बेहद उपयोगी है.

3. चीनी के स्थान पर गुड और खजूर का प्रयोग –

आयुर्वेद के अनुसार निरोगी काया और दीर्घायु जीवन के लिए गुड का सेवन अत्याधिक उपयोगी है. गुड गन्ने से प्राप्त अनरिफाइंड शुगर के रूप में सम्पूर्ण भारत में प्रयोग किया जाता है, जिससे शरीर से एसिड कम होता है तथा पाचन शक्ति बढती है. सर्दियों में गुड और खजूर खाने से शरीर को पर्याप्त गर्मी प्राप्त होती है.

4. सूखे मेवों और तिलहनों का प्रयोग –

 जनवरी की कडकडाती सर्दी में सूखे मेवे, जिनमें बादाम, काजू, अखरोट, मुनक्के, किशमिश, फूल मखाने आदि का प्रयोग अवश्य करना चाहिए. इन्हें हल्का भुन कर दिन भर में एक मुट्ठी के जितना प्रयोग करना सर्दियों में श्रेष्ठतम माना गया है. ये सभी विशेष खनिज गुणों से भरपूर होते हैं, जिनसे हड्डियों को मजबूती, मस्तिष्क को तरावट एवं रक्त संचरण को सुगमता प्राप्त होती है.

तिलहनों में मूंगफली, तिल, अलसी आदि के प्रयोग से भी सर्दियों में निरोगी काया का वरदान पाया जा सकता है. इनसे शरीर को गर्माहट मिलने के साथ साथ विटामिन, प्रोटीन और आयरन जैसे पोषक तत्त्व भी मिलते हैं.

5. सर्दियों में तेलों का प्रयोग –

सरसों का तेल सर्दियों के मौसम के लिए बहुत अच्छा होता है क्योंकि यह विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है. कैलोरी में उच्च होने के साथ ही यह हृदय रोगों और मधुमेह के लिए सर्वश्रेष्ठ है. साथ ही कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए भी सरसों के तेल का प्रयोग हितकर है.

इसके अतिरिक्त अलसी का तेल, ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर है, अलसी में 23 प्रतिशत ओमेगा-3 फैटी एसिड, 20 प्रतिशत प्रोटीन, 27 प्रतिशत फाइबर, लिगनेन, विटामिन बी ग्रुप, सेलेनियम, पोटेशियम, मेगनीशियम, जिंक आदि पाए जाते हैं. जिसके कारण अलसी शरीर को स्वस्थ रखती है व दीर्घायु होने में सहायता करती है.  

सर्दियों में तिल के तेल के भी अनेक फायदे होते है, यह विटामिन ई, बी कॉम्प्लेक्स, कैल्शि‍यम, मैग्नीशि‍यम, फॉस्फोरस और प्रोटीन जैसे न्यूट्रिएंट्स से युक्त होता है. यही कारण है कि तिल के तेल से हड्ड‍ियां मजबूत होती हैं. अपनी गर्म प्रकृति के कारण ये शरीर को गर्माहट प्रदान करता है, इसलिए इस तेल को सर्दियों में उपयोग करने की सलाह दी जाती है.

6. मसालों का प्रयोग –

सर्दियों के भोजन में जीरा, अजवाईन, हल्दी, हींग, दालचीनी, सौंठ, काली मिर्च जैसे मसालों का प्रयोग उचित है. ये खाद्य सामग्री पाचन में सुधार करने में मदद करती हैं और सर्दियों में अधिक खाने के कारण हुई एसिडिटी का सामना नहीं करना पड़ता है. साथ ही ये मसालें शरीर के तापमान को बढ़ाने में मदद करते हैं.

7. आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का सर्दियों में प्रयोग –

जनवरी माह में जब सर्दी अपने चरम पर होती है, तब कुछ खास औषधीय जड़ी-बूटियां शरीर के लिए लाभप्रद होती है. इनमें तुलसी, अश्वगंधा, ब्राह्मी, मुलहठी आदि के थोड़ी मात्रा में प्रयोग से स्वास्थ्य लाभ उठाया जा सकता है. ये औषधियां सर्दियों में होने वाली मौसमी बीमारियों से शरीर की रक्षा कर प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती हैं. इनका प्रयोग च्यवनप्राश या हर्बल पेय के रूप में सरलता से किया जा सकता है. 

अतः जनवरी माह, जो भारत में अत्याधिक सर्दी के साथ साथ मकर सक्रांति, लोहड़ी, पोंगल, षट्तिला एकादशी, गणतंत्र दिवस आदि सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय पर्वों से भी जुड़ा हुआ भी है, सम्पूर्ण विश्व में नववर्ष के प्रथम माह के रूप में देखा जाता है.  यदि भारतीय संस्कृति, परंपरा और धर्म के आधारभूत स्तम्भों के साथ जुड़कर इस माह के अंतर्गत कुछ विशिष्ट आयुर्वेदिक नियमों का पालन करके निरोगी काया का वरदान पाया जा सकता है. 

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